अपने लिए !
वर्षा गर्ग,मुम्बई

” जरा बाजार हो आइए आप,ये रही लिस्ट और थैली भी रख दी है।” रीना के हाथों से थैली लेते हुए लिस्ट पढ़ते ही चौंक गए गोपाल जी।
“ये इतना सब क्यों मंगा रही हो? बच्चे भी नहीं आ रहे बस हम दोनों ही तो हैं।”
” हम दोनों तो हैं ना।साल में एक ही बार तो आती है दीपावली। हमेशा कभी घर के बड़े बुजुर्गों तो कभी बच्चों के हिसाब से सब त्यौहार मनाते रहे हैं। इस साल पहली बार ही हम दोनों हैं, जितना संभव हो सकता है सब कुछ करने का सोचा है मैंने।”
गोपाल जी सोच में पड़ गए।
सही कह रही है रीना।हम दोनों तो हैं ना।जो भी बन पड़ेगा ,सब करेंगे। इलेक्ट्रीशियन को बोल देंगे रंगीन झालर लगा जायेगा।
बाजार से लौटते हुए मिट्टी के दीयों के साथ,कुछ रंगीन फुलझड़ी, अनार के पैकेट और रंगोली लाना भी नहीं भूले वो।
रीना के साथ गुझिया भी बनवाईं।
दीपावली के माहौल का जम कर लुत्फ उठाने का इरादा करते हुए हमउम्र दोस्तों को फ़ोन पर निमंत्रण भी दे दिया।
इस बार बहुत वर्षों बाद अपने अंदर बच्चों सा उत्साह चमत्कृत कर रहा है। रीना भी खुशी की तरंगों में लिपटी घुटने का दर्द और कमर की जकड़न भूल चुकी है। उन दोनों को ही इस बात का अहसास है कि औरों का ध्यान रखते हुए वे दोनों अपने लिए जीना भूल ही चुके थे।
शाम को वीडियोकॉल पर बच्चे भी हैरान हुए दोनों को परम आनंदित देख।
बेटे ने कह भी दिया,”यही तो कबसे चाहते थे दीदी और मैं कि आप दोनों अपनी जिंदगी,अपने लिए भी जिएं।
बहुत अच्छा लग रहा है
मॉं-पापा!आपको इस तरह देख कर।”
बच्चों को आशीर्वाद देते हुए गोपाल जी अचानक सीटी बजाते हुए गुनगुना उठे…ज्योत से ज्योत जलाते चलो…
और बाहर दीए की लौ को संवारती रीना जी के गाल आरक्त हो उठे…पता नहीं क्यूं…?
