तक्षित साहित्य धारा

महालक्ष्मी

लघुकथा


मानसिंह ‘शरद’
“देखो पूरा घर दीपों से जगमगा रहा है। लेकिन मेरे मन में अंधेरा है। माँ के बिना घर मूर्ति विहीन मंदिर जैसा है। मुझे कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा।” सुरेश ने पत्नी सुरेखा से कहा।
“माँ को हम कभी नहीं भूल सकते। लेकिन देखिए थोड़ी बहुत तनातनी हर घर में होती है। क्या नाराज होकर कोई वृद्धाश्रम जाता है भला ?” दीपों में बाती रखते हुए सुरेखा ने कहा।
“हाँ यह तो है, घर में चार बर्तन होंगे तो आवाज तो होगी ही। फिर भी माँ का इस तरह  घर छोड़ कर जाना अच्छा नहीं हुआ।”
देखो सुरेश, हम दोनों ने माँ के पास जाकर उनसे माफी भी मांगी। किंतु वे टस से मस नहीं हुई। उल्टे हम दोनों को खूब खरी खोटी सुनाई। बताओ, अब हम करें तो क्या करें ?”
” सही कह रही हो मुझे तो कुछ समझ नहीं आ रहा।  अब सुनील को ही देख लो रात के आठ बज रहे हैं लाट साब के आने के पते नहीं।” सुरेश चिंतित हो बोला।
“वहीं तो मैं कह रही हूँ। लक्ष्मी पूजन का समय हो रहा है।
मेरा फोन भी नहीं उठा रहा। जरा आप फोन करो तो।” सुरेखा तीखे लहजे में बोली।
सुरेश जैसे ही फोन करने को हुआ। सुनील की कार का हॉर्न बज उठा। पति पत्नी दोनों दरवाजे की ओर दौड़े।उन्होंने देखा कि हजारों दीप जगमगा रहें है। उनके बीच खड़ी महालक्ष्मी आशीर्वाद की मुद्रा में मुस्कुरा रही है। सुनील हुलस कर बोला “पापा मैं दादी को ले आया।”


                            

Dr. Sanjay Nagar

Author & Co-Founder Takshit News

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