साहित्य

तक्षित साहित्य धारा के इस अंक में आनंद लीजिये साहित्य की विभिन्न विधाओं का

घुमड़ते बादल
डॉ. नेत्रा रावणकर


क्यों होता है ऐसा?
गुनगुनाती हैं जब तनहाइयाँ
अंदर ही अंदर एक विचार
उमड़ता -घुमड़ता है
बादलों की तरह
कभी शांत -नीरव
तो कभी दामिनी के तीर सा
एक कवायद रहती है निरंतर
धरातल पर उतर आते है
शब्द पखेरू
जुड़ती रहती है शब्दों की श्रृंखला
जैसी हो रंगोली
टिपके -टिपके वाली
मन बेचैन, अधीर
घूमता रहता है
उसी परिधि के आसपास
जब तक शब्द नहीं होते प्रस्फुटित
गहन प्रसवपीड़ा की प्रक्रिया के बाद
जन्म लेती है कविता
तब मन उड़ता है
मुक्त गगन में
और तैरता रहता है
सागर के हिल्लोल में …

लघुकथा
दीया तले…
मानसिंह ‘शरद’

“शर्मा जी, आपने अपने दोनों बच्चों को इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ाया। आपका एक लड़का इसी शहर के महाविद्यालय में अंग्रेजी का प्रोफेसर और दूसरा शहर के प्रसिद्ध  इंग्लिश कोचिंग क्लासेस का मालिक है।” पत्रकार ने हिंदी साहित्य के प्रोफेसर से कहा।
“सही कह रहे है आप”
“कुछ प्रश्न पूछना चाहता हूँ आपसे।”
“पूछिए”
“हिंदी का भविष्य क्या है ?”
“देखिए संस्कृत की बेटी हिंदी का भविष्य…”  बोलते बोलते शर्मा जी रुक गए क्योंकि पोछा लगा रही कामवाली बाई बीच में बोल उठी “साब,आपके यहाँ मेरी बेटी को भी झाड़ू पोछे के लिए रख लीजिए”

मैं, मरी मक्खी और मेरी कॉफी
सौरभ ‘चातक’
मौसम था सुहाना,

मौसम था सुहाना,
मिल गया कॉफी पीने का बहाना।
मैंने कॉफी का ऑर्डर फरमाया,
वेटर कॉफी का प्याला लाया।
लेकिन आपको एक बात बता दूँ,
इस कैफ़े की खासियत जता दूँ।
मालिक का हुनर जगजाहिर था,
हर स्थिति पर फ़िल्मी गाना बजाने में माहिर था।
जैसे ही कॉफी होठों से लगाई,
कॉफी में काली-कलूटी मरी मक्खी तैरती नज़र आई।
तभी गाना बजा—
“हम काले हैं तो क्या हुआ, दिलवाले हैं…”
मैंने चिल्लाकर वेटर को बुलाया
और इशारे से कॉफी का प्याला दिखाया।
वेटर बोला—
“साहब! लगता है आपका दिमाग़ खप्ती है।
अगर मक्खी मर गई है, तो भला तैर कैसे सकती है?”
मैंने डाँटते हुए कहा—
“भाई! जल्दी जाओ, मेरे लिए नई कॉफी लाओ।”
लेकिन मेरी फूटी किस्मत मुझ पर मेहरबान थी,
दूसरी कॉफी में भी मरी मक्खी मेरी मेहमान थी।
मैंने गुस्से में टेबल ठोका,
वेटर ने आकर मुझे टोका।
वेटर बोला—
“चुपचाप पी लीजिए साहब। मालिक को कुछ नहीं बताएँगे। आपसे सिर्फ़ कॉफी का पैसा लिया जाएगा, मक्खी का कोई अतिरिक्त शुल्क नहीं लगाएंगे।”
तभी गाना बजा—
“जो तुमको हो पसंद, वही बात कहेंगे…”
अब मेरा गुस्सा सातवें आसमान पर था,
और वेटर नई कॉफी लाने के अभियान पर था।
लेकिन नियति का देखो कैसा खेल था,
हर बार वही कॉफी और मरी मक्खी का मेल था।
मैंने गुस्से में वेटर का कॉलर पकड़ा।
वेटर थोड़ा सा अकड़ा
वह बोला—
“साहब! आप अपना आपा क्यों खोते हैं? मरी मक्खी कॉफी नहीं पीएगी, जो इतना रोते हैं!”
तभी गाना बजा—
“रोते-रोते हँसना सीखो…”
मैंने कहा—
“बकवास बंद कर, वरना कॉफी का पैसा नहीं भरूंगा
और मैनेजर से तेरी शिकायत करूँगा।”
वेटर बोला—
“क्षमा कीजिए प्रभु! अभी नई कॉफी लेकर आता हूँ।”
वह फिर नई कॉफी लेकर आया,
लेकिन नज़ारा वही नज़र आया।
मैं झल्लाकर बोला—
“ये क्या! इसमें भी मक्खी डूबी है?”
वेटर मुस्कुराया—
“साहब! हमारी कॉफी ही इतनी लाजवाब है कि स्वाद की मारी मक्खी भी खुद को रोक नहीं पाती, यही इसकी खूबी है”
फिर गाना बजा—
“जीना यहाँ, मरना यहाँ…”
अब मेरा खून खौल रहा था।
और मन ही मन प्यारे-प्यारे मंत्र बोल रहा था।
फिर भी मैंने-
मैंने एक और कॉफी मँगाई,
लेकिन कहानी फिर वही दोहराई ।
मैंने कहा—
“मैं इसका बिल नहीं दूँगा।
तुझे जेल भिजवा दूँगा।”
वेटर धीरे से मुस्कुराया और बोला—
“साहब! ज़रा अपना चश्मा साफ़ कीजिए। मक्खी कॉफी में नहीं, आपके चश्मे पर बैठी है।”
यह सुनते ही मेरे होश उड़ गए।
मैंने चश्मा उतारकर देखा—
मक्खी अपने कारनामे पर इतरा रही थी,
और सचमुच चश्मे पर बैठी -बैठी मुस्कुरा रही थी।
तभी गाना बजा—
“हाल कैसा है जनाब का…”
वेटर ने मुस्कुराते हुए जेब से छह बिल निकालते हुए बोला—
“मुझे पहले ही पूरा खेल समझ में आ रहा था। इसलिए मैं जानबूझकर वही कप बार-बार ला रहा था ।
मैं आपको बस इतना समझाना चाह रहा था ,
कि हर दिखाई देने वाली चीज़ सच नहीं होती।
अरे!चश्मे की मक्खी तो उड़ जाएगी,
पर कम से कम होटल की कमाई तो हो जाएगी।”
उसकी बात ने मेरी आँखों से भ्रम का पर्दा हटा दिया।
सीख यही मिली—
देखने और बोलने से पहले स्वयं को परख लेना चाहिए।
चश्मा साफ़ हो या न हो, लेकिन दिमाग़ हमेशा साफ़ होना चाहिए।
और अंतिम गाना बजा—
“ज़िंदगी कैसी है पहेली…”

सोलह दिनों तक आंगन में सजती है ‘संजा’,
श्रीमती सुमन नागर

गोबर, फूल-पत्तियों और रंगीन कागजों से रोज बनती हैं नई आकृतियां, संजा गीतों से गूंजते हैं मालवा के घर-आंगन
श्राद्ध पक्ष के सोलह दिनों में जहां लोग श्रद्धापूर्वक अपने पितरों का स्मरण करते हैं, वहीं मालवांचल के घर-आंगन में एक ऐसी लोकपरंपरा भी जीवंत हो उठती है, जिसमें कला, लोकगीत, प्रकृति और संस्कार एक साथ दिखाई देते हैं। यह परंपरा है ‘संजा’ की।
इन दिनों घरों की दीवारों और आंगन में गोबर, फूल-पत्तियों तथा रंगीन कागजों से प्रतिदिन अलग-अलग आकृतियां बनाई जाती हैं। हर दिन संजा का नया रूप सजता है और संध्या होते ही बालिकाएं उसके सामने एकत्रित होकर सुमधुर मालवी लोकगीत गाती हैं। इन लोकगीतों की मधुर स्वर-लहरियां वातावरण को पारंपरिक रंग में रंग देती हैं।
संजा केवल आकृतियां बनाने और गीत गाने की परंपरा नहीं है। इसके पीछे लोकजीवन से जुड़े संस्कार और पारिवारिक मूल्यों की गहरी भावना भी जुड़ी हुई है। संजा गीतों के माध्यम से बालिकाओं को परिवार, रिश्तों, प्रेम, सम्मान, मर्यादा और जिम्मेदारी जैसे जीवन मूल्यों से परिचित कराया जाता है। पारंपरिक रूप से इन गीतों में विवाह के बाद ससुराल और परिवार के प्रति जिम्मेदारियों तथा घर-परिवार की गरिमा बनाए रखने के भाव भी अभिव्यक्त होते रहे हैं।
लोककला से जुड़ती नई पीढ़ी
आज जब आधुनिक जीवनशैली के कारण अनेक पारंपरिक लोककलाएं धीरे-धीरे पीछे छूट रही हैं, ऐसे समय में संजा पर्व का महत्व और भी बढ़ जाता है। संजा के माध्यम से बालिकाएं न केवल अपनी रचनात्मकता को अभिव्यक्त करती हैं, बल्कि अपनी मालवी लोकभाषा, लोकगीतों, प्रकृति और सांस्कृतिक जड़ों से भी जुड़ती हैं।
मालवा की पहचान केवल उसके ऐतिहासिक और धार्मिक स्थलों से नहीं, बल्कि ऐसी अनगिनत लोकपरंपराओं से भी है, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी हमारी संस्कृति को जीवंत बनाए हुए हैं। संजा भी इसी समृद्ध लोक विरासत की एक सुंदर कड़ी है।
संरक्षण की जरूरत
समय के साथ बदलती जीवनशैली के बीच संजा की परंपरा को जीवंत बनाए रखना समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। घरों में बच्चों को संजा बनाना सिखाना, मालवी लोकगीतों से परिचित कराना और इस परंपरा के सांस्कृतिक महत्व को समझाना ही इसे आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने का सबसे प्रभावी माध्यम हो सकता है।
संजा के सोलह दिन हमें यह संदेश देते हैं कि लोकसंस्कृति केवल इतिहास के पन्नों में सुरक्षित रखने की चीज नहीं, बल्कि उसे अपने घर-आंगन और जीवन में जीवंत रखने की जरूरत है।

सतीश राठी स्मृति सम्मान 2026 की घोषणा, सन्तोष सुपेकर होंगे सम्मानित

उज्जैन। वर्ष 1983 से लघुकथा विधा के संवर्धन, विकास और प्रचार-प्रसार के लिए निरंतर सक्रिय साहित्यिक संस्था क्षितिज साहित्य संस्था, इंदौर ने स्वर्गीय सतीश राठी की स्मृति में वर्ष 2026 के लिए ‘सतीश राठी स्मृति सम्मान’ की घोषणा की है। यह सम्मान अदिति सिंह अमित सिंह भदौरिया के सहयोग से प्रदान किया जाएगा।
क्षितिज साहित्य संस्था, इंदौर के अध्यक्ष नंदकिशोर बर्वे एवं सचिव दीपक गिरकर ने बताया कि वर्ष 2026 में लघुकथा के वरिष्ठ वर्ग में उज्जैन के वरिष्ठ लघुकथाकार सन्तोष सुपेकर तथा कनिष्ठ वर्ग में जयपुर की लघुकथाकार श्रीमती अनीता सैनी को ‘सतीश राठी स्मृति सम्मान’ से सम्मानित किया जाएगा।
सन्तोष सुपेकर को लघुकथा के क्षेत्र में उनके अनवरत सृजन, सुदीर्घ साहित्यिक सक्रियता तथा लघुकथा विधा में उल्लेखनीय योगदान के लिए यह सम्मान प्रदान किया जा रहा है। उन्हें ₹11,000 की सम्मान राशि, शाल, श्रीफल एवं सम्मान-पत्र प्रदान किया जाएगा।
इसी प्रकार श्रीमती अनीता सैनी को लघुकथा के क्षेत्र में उनके निरंतर सृजन तथा उल्लेखनीय साहित्यिक योगदान के लिए ‘सतीश राठी स्मृति सम्मान’ के कनिष्ठ वर्ग से सम्मानित किया जाएगा। उन्हें ₹5,100 की सम्मान राशि, शाल, श्रीफल एवं सम्मान-पत्र प्रदान किया जाएगा।
दोनों सम्मानित लघुकथाकारों को क्षितिज साहित्य संस्था, इंदौर के वार्षिक आयोजन में 15 नवंबर 2026 को सम्मानित किया जाएगा।
उल्लेखनीय है कि स्वर्गीय सतीश राठी लघुकथा के प्रति आजीवन समर्पित रहे। उन्होंने न केवल स्वयं लघुकथा का सृजन किया, बल्कि इस विधा के विकास, विस्तार और नए रचनाकारों को प्रोत्साहित करने में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी स्मृति में प्रारंभ किया गया यह सम्मान लघुकथा के क्षेत्र में निरंतर और उल्लेखनीय सृजन करने वाले रचनाकारों को प्रोत्साहित करने की दिशा में एक सार्थक पहल है। ये दोनों सम्मान प्रतिवर्ष प्रदान किए जाएंगे।

Dr. Sanjay Nagar

Author & Co-Founder Takshit News

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