साहित्य

हृदय स्पर्शी रचनाओं सहित साहित्यिक गतिविधियों से रूबरू कराता तक्षित साहित्य सुधा का अंक


काश समझ पाते तुम!
अमृता उशारिया


काश समझ पाते तुम!
कि तुम्हारा रूठना भी
सदा के लिए नहीं है
और न मेरा मनाना।
छोटी छोटी बूंदें हैं ये लम्हें,
सागर में समाने के बाद
कोई वजूद नहीं इनका।
प्यार की रौशनी में,
दिखता है वो सब
जो छिप जाता है
नफ़रत के अंधेरों में…
सिक्के के इन दो पहलुओं
में से, कौनसा चुनोगे?

वह तुम हो माँ
तरुण कुमार उपाध्याय ‘देव’
उज्जैन 9425495131



तुम एक शक्ति पुंज हो माँ,
उसमें से जो प्रकाश रश्मियाँ निकलती हैं।
जो कि दिखाती हैं, रास्ता मुझे,
वह तुम हो माँ।
जब भी मैं होता हूँ
सुख दुःख या विकट परिस्थितियों में,
तो पाता हूँ एक शक्ति को पास मेरे,
वह तुम हो माँ।
जब भी देखता हूँ,
गरीब,दीनहीन,व्यक्ति को,
तो मुझे याद आता है अतीत,
अहसास होता है जिसका,
वह तुम हो माँ।
बीते हुए पल मुझे अच्छी तरह याद हैं,
वह याद दिलाते हैं तुम्हारी,
वह तुम हो माँ।
क्या क्या नहीं किया तुमने मेरे लिए,
पतझड़ को बनाया बसंत मेरे लिए,
हर मौसम में याद आती है जिसकी,
वह तुम हो माँ।
हर परिस्थिति से लड़ना/जूझना सिखाया है तुमने,
जो भी हूँ आज
वह परिणाम है,तुम्हारे दिए गए संस्कारों का ,
वह तुम हो माँ।
तुम्हारा आशीष था,
अभी भी हैं और
आगे भी होगा जो
आर्द्र अनुभव,
वह तुम हो माँ।
जिसे भी देखता हूँ मन से,एक परछाई सी दिखाई देती हैं,
वह तुम हो माँ।
तुम जहाँ भी हो,
मुझ पर बनाए रखना आशीष,
सिर पर सदैव पाता हूँ जो हाथ,
वह तुम हो माँ।
मां को सादर नमन

धन और मन
मीरा जैन
516,साँईनाथ कालोनी . सेठीनगर
उज्जैन . -( म.प्र.)
9425918116



घर में कदम रखते ही प्रतिभा उबल पड़ी-
” मैंने फोन पर आपको बता ही दिया था कि मैं रक्षाबंधन पर आपकी बहन को देने के लिए साड़ी लेने जा रही हूं, फिर क्या जरूरत पड़ गई थी ऑफिस से लौटते वक्त आपको साड़ी लाने की? वह भी इतनी सुंदर! निश्चित ही महंगी होगी। और साथ में सलवार सूट का कपड़ा भी! क्या घर में पैसों का पेड़ लगा है—?” विवेक कुछ कहता उससे पूर्व ही गृहकार्य में रत रामू बीच में ही बोल पड़ा-
” बी बी जी ! आप साहब पर नाराज मत होइए ये कपड़े तो रक्षाबंधन पर मैं, अपनी दीदी और भांजी को देने के लिए लाया हूं।”

सरप्राइज
मानसिंह ‘शरद’
9826227152



ट्रेन अपनी पूरी रफ्तार से दौड़ रही थी। उस रफ्तार से कहीं अधिक शीतल के मन-मस्तिष्क में विचारों का कारवाँ आगे बढ़ रहा था। शीतल ने पिता के गुजर जाने के बाद क्या नहीं देखा। उसकी बड़ी बहन सीमा ने पूरे घर की जिम्मेदारी अपने कंधों पर उठा ली । वह हर बात का ध्यान रखती। चाहे माँ की दवाई हो, शीतल की पढ़ाई का खर्च हो, या गृहस्थी का कोई अन्य खर्च। जिम्मेदारियों का बोझ इतना अधिक था कि उसने विवाह का खयाल ही छोड़ दिया। समय के पंख होते है। छोटी शीतल कब बड़ी हो गई। कब सर्विस लग गई। कब शादी हो गई, समय का पता ही नहीं चला।
ट्रेन के प्लेटफार्म पर रुकते ही, शीतल ने खिड़की के बाहर देखा। उसका स्टेशन आ चुका था। उसने ऑटो लिया और पहुँच गई सीमा के द्वार।
“अरे शीतल …. कैसे आना हुआ ?”
“सरप्राइज़ देने आई हूँ।”
“कैसा सरप्राइज़ ?”
“बताती हूँ, बताती हूँ।”
इधर उधर की बातें करने के बाद, शीतल ने एक थाली सजाई। थाली में रखे कुमकुम,अक्षत,नारियल,रुमाल, मिठाई और राखी नक्षत्रों की तरह चमक रहे थे।
“मेरी प्यारी बहना ….आप मेरी बहन के साथ- साथ भाई भी हो।” शीतल ने राखी बांधते हुए सीमा से कहा।

शोनित के गीत
कवि रूप सिंह हाड़ा
पीथमपुर इंदौर
मो. 9039034450



आजादी की शमा जली है, आज पतंगे दीवाने।
होड़ लगी है जल्दी मर कर, पुनर्जन्म में फिर आने।।
मीरा जैसा पागलपन है, मन में भारत भक्ति है।
इसीलिए तो काल कोठरी, ब्रज की भूमि लगती है।।
कोई आगे बढ़कर खा जाता है सीने पर गोली।
कोई फांसी चढ़कर बोला वंदे मातरम की बोली।।
कोई हनुमान के जैसे सीना चीर दिखाता है।
राम नहीं निकले तो क्या है सीने बीच तिरंगा है।।
मैं ईश्वर के नाम से भी पहले शोणित के गीत सुनाता हूं।
मंदिर से पहले शहीद के दर पर शीश झुकाता हूं।।
छप्पन भोग नहीं खाए हैं भारत मां के बेटों ने।
यहां घास की रोटी खाकर भोग लगाए भक्तों ने।।
चंदन से बढ़कर माना माटी का तिलक लगाया है।
भजन नहीं आता है कोई वंदे मातरम् गाया है।।
यहां दूध और गंगाजल का कोई मोल नहीं होता।
अभिषेक गोली से होता पिस्टल साथ लिए सोता।।
सोता भी क्या कहूं, रात और दिन में भेद नहीं होता।
आंखों में आजादी वाला सपना सदा लिए सोता।।
मैं ऐसे अमर शहीदों की पूजा में पलक झुकाता हूं।
मंदिर से पहले शहीद के दर पर शीश झुकाता हूं।।

बाबूजी
डॉ. विक्रम विवेक, उज्जैन
Mob.-8770208317
9926425133



घर की समृद्धि के लिए दुनिया नापते रहे,
मेरी खातिर दर-बदर भटकते रहे,
ये एक जोड़ी “जूते”,
किसी भूल या अपराध से सजग करती,
घर की बैठक में पड़ी,
शिक्षक की तरह एक “छड़ी”,
एक ‘पायजामा’ और फटा ‘कुर्ता’ है,
हर गलती पर जैसे आज भी घूरता है,
वो मोटे काँच का “चश्मा”,
पर अब अपने हुए पराए,
जो कल तक कदमों में थी,
वही दुनिया, आज आँखें दिखाती है,
कहां चले गए लौट आओ, “बाबूजी”,
तुम्हारी बहुत याद आती है,
कोमलता त्याग कठोरता दिखाई,
दुनियादारी सिखाने के लिए,
इतना झुके कि गिर तक गए,
औलाद को ऊंचा उठाने के लिए,
लड़ते रहे जमाने से एक योद्धा की तरह,
सिर्फ और सिर्फ मुझे जिताने के लिए,
त्याग, समर्पण का साक्षात उदाहरण थे आप, परिवार की खुशी का कारण थे आप,
बचाते रहे सदा, अंगारों सी धूप, कड़कती ठंड, और आफत की बारिश से,
हमारी हर समस्या का निराकरण थे आप,
पर आपका अचानक यूं चले जाना,
जैसे धरती का धूरी से हट जाना,
या अकस्मात आसमान का फट जाना,
खुशियों का टूट कर बिखर जाना,
मानो बाप के बजाय बच्चों का मर जाना।

श्रम का सम्मान करें
– प्रियंका ‘क्षितिज



हर श्रम का सम्मान करे, हर श्रमिक का मान करे।
श्रम पर टिकी हे दुनिया सारी है श्रमिक से जान हमारी जीवन का अनमोल हे धन श्रम, श्रमिक और वतन।

राखी का धागा: रिश्तों से राष्ट्र तक
डॉ. नेत्रा रावणकर उज्‍जैन



रक्षाबंधन केवल भाई- बहन के प्रेम का पर्व नही, बल्कि इसके पीछे कई सुंदर पौराणिक प्रसंग भी है। महाभारत के एक प्रसिद्ध प्रसंग में एक बार श्रीकृष्‍ण की उंगली में चोट लगने से रक्‍त निकलने लगा द्रौपदी ने तुरंत अपनी साडी का टुकडा फाड़कर कृष्‍ण की उंगली पर बांध दिया। कृष्‍ण ने द्रौपदी को भविष्‍य में रक्षा का वचन दिया और कौरवों की द्यूत सभा में जब द्रौपदी का वस्‍त्रहरण हो रहा था, तब उसकी लाज बचाई। देवासुर संग्राम में जब इंद्र के उपर संकट आया तब इन्द्राणी ने उनके कलाई पर पवित्र रक्षा-सूत्र बाँधा और इंद्र को युद्ध में सफलता मिली। यमुना ने भी अपने भाई यमराज को घर बुलाकर भोजन करवाया और उनकी कलाई पर रक्षासूत्र बाँधा।
यमराज ने भी वरदान दिया कि जो भाई अपने बहन से राखी बंधवाकर उसका सम्‍मान करेगा, उसे सुख-समृद्धि प्राप्‍त होगी।
ऐतिहासिक प्रसंग के अंतर्गत 1905 में जब ब्रिटीश सरकार ने बंगाल का विभाजन किया तब रविन्द्रनाथ ठाकुर ने रक्षाबंधन के प्रतीक का उपयोग हिंदु -मुस्लिम एकता के संदेश के लिए किया। स्‍वतंत्रता आंदोलन के दौरान भी राखी और रक्षा सूत्र की भावना का उपयोग जाति, धर्म, क्षेत्र के भेद से उपर उठकर आपसी एकता को प्रेरित करने के लिए किया गया। इस तरह राखी का धागा हमें याद दिलाता है रिश्‍ते के बल अधिकारों से नहीं बल्कि कर्त्तव्‍यों से मजबूत होते है। यदि हम अपने आसपास के प्रत्‍येक व्‍यक्ति की गरिमा, स्‍वतन्‍त्रता और सुरक्षा का सम्‍मान करने का संकल्‍प ले, तो यही राखी सामाजिक सद्भाव की डोर बन सकती है।
आज जब समाज अनेक चुनौतियों जैसे भेदभाव, हिंसा, पर्यावरण संकट, सामाजिक वैमनस्‍य और डिजिटल असुरक्षा का सामना कर रहा है तब रक्षाबंधन का संदेश और भी प्रासंगिक हो जाता है। भारतीय परम्‍परा में रक्षा का अर्थ केवल किसी व्‍यक्ति को बाहरी संकट से बचाना नही, बल्कि उसके अधिकारों, सम्‍मान और अस्तित्‍व की रक्षा करना भी है। जब यही जिम्‍मेदारी राष्‍ट्र के प्रति जागरूकता में बदलती है, तब राखी की डोर रिश्‍ते से राष्‍ट्र की ओर बढती है। सैनिक देश की सीमाओं पर तैनात होकर राष्‍ट्र की रक्षा करते है उसी प्रकार किसान, शिक्षक, चिकित्‍सक, वैज्ञानिक, श्रमिक, विद्यार्थी प्रत्‍येक जिम्‍मेदार नागरिक ने अपने -अपने क्षेत्र में राष्‍ट्र निर्माण में योगदान देना चाहिए। प्रत्‍येक नागरिक अपने कर्त्तव्‍यों का निर्वहन करेगा, जैसे ईमानदारी से कार्य करना, सार्वजनिक सम्‍पत्ति की रक्षा करना, कानून का सम्‍मान, पर्यावरण को बचाना ,करों का उचित भुगतान करना ऐसे छोटे-छोटे दायित्‍वों को निभाकर राष्‍ट्रहित को व्‍यक्तिगत स्‍वार्थ से उपर उठा सकते है।

पुस्तक समीक्षा-
ऋता शेखर ‘मधु ‘
लघुकथा विधा को ऊँचाई तक पहुँचाती कृति-
“सातवें पन्ने की खबर”



सातवें पन्ने की खबर यह नाम है सुस्थापित लघुकथाकार आदरणीय सन्तोष सुपेकर जी की सद्य प्रकाशित पुस्तक का। पुस्तक का नाम ही सर्वप्रथम आकर्षित करता है। पेज थ्री तो पता था, सातवाँ पन्ना क्या है। वरिष्ठ साहित्यकार सतीश राठी जी की भूमिका से पता चला कि व्हाट्सएप्प जैसी मीडिया का दुपयोग किस प्रकार होता है, इस विषय पर सुपेकर जी की लघुकथा है और उसे ही पुस्तक के नामकरण में रखा गया। राठी जी की भूमिका पढ़कर जिज्ञासा उत्पन्न हो तो यह भूमिका की सफलता है।
पुस्तक माता-पिता को समर्पित की गई है।
आगे लेखक का आत्मकथ्य लघुकथा के बारे में स्पष्ट रूप से अपनी बात रखने में सफल है। ” लघुकथा पढ़ना जितना सरल है उसे लिखना, रचना उतना ही कठिन। समझ लीजिए आपको ढेर सारा सामान, फर्नीचर दे दिया गया है और उसे अत्यंत छोटे कमरे में इस तरह से सजाना है कि सारा सामान समा भी जाये और बेतरतीब भी न लगे।”
इस पुस्तक में सुपेकर जी की 112 लघुकथाएँ हैं। सभी पढ़कर अचंभित हो रही हूँ कि किस प्रकार दैनिक जीवन से कथावस्तु उठायी गयी है। कुछ लघुकथाओं का जिक्र करना चाहूँगी। “सातवें पन्ने की खबर” में बताया गया है कि जो खबर आम जन के मन मस्तिष्क पर छाप छोड़ती है वह मीडिया वालों के लिए किस तरह नगण्य होती है।
लघुकथा ‘मजबूत स्वर’ दैनिक जीवन से जुड़ी बहुत अच्छी लघुकथा है। जो छुट्टी का दिन बच्चों के लिए सुकून देनेवाला होता है , क्या वह सुकून सभी को मिल पाता है।एक किसान के लिए कभी छुट्टी नहीं, और एक गृहिणी को भी सुबह में देर तक सोने का सुख नहीं मिल पाता। लेखक का कथ्य जब बहुत वर्गों का प्रतिनिधित्व करे तो वह कहन सार्थक लगता है।
“भीगी आँखों के ठहाके”, बहुत ही भावपूर्ण कथा है। यहाँ मुझे तीन बिन्दु दिखे। प्रथम बिन्दु कि बारहवीं के बाद जब बच्चे किसी खास दिशा की ओर अग्रसर होते हैं तो उत्तर भारत में यह समस्या अधिक बड़ी दिखती है।उच्च शिक्षा के लिए उत्तर से अधिक सुलभ दक्षिण भारत लगता है। किन्तु यह सभी के लिए सम्भव नहीं हो पाता। बच्चे को अनजान शहर में भेजना एक बात तथा दूसरी बात खर्च से सम्बंधित है। दूसरा बिन्दु कि ऐसे में यदि अभिभावक यह सुविधा नहीं दे पाता तो इसे किस तरह घर के सदस्यों का कोपभाजन बनना पड़ता है, यह कथा पढ़कर ही जाना जा सकता है। तीसरा बिन्दु बेहद संवेदनशील है। अभिभावक का यह प्रयास करना कि वह यह नाराज़गी कैसे दूर करे। जब वह सफल होता है तो ही लगते है ठहाके, भीगी भीगी आँखों से। उत्तर भारत के कई परिवारों की कथा हो सकती है यह लघुकथा।
पहचान का संकट’ ओह… जैसे छब्बीस साल पहले मैं ही खड़ी हूँ वहाँ पर और वह दौड़कर हमारे पास आता था। बिल्कुल अपनी सी लगने वाली लघुकथाएँ लेखक और पाठक के बीच अनोखा तारतम्य बना देती हैं। मैं कुछ ही कथाओं पर लिखने वाली थी किन्तु पढ़ते हुए यह सम्भव नहीं लग रहा। लघुकथा “पर हाँ…” , क्या कहूँ… मन भर आया। माओं के पास हर समस्या का समाधान होता है, बच्चो को यह समझते समझते बहुत देर हो जाती है। लघुकथा “उनके हिस्से की धूप”, महानगर की ऊँची अट्टालिकाओं के कारण छिन गयी धूप पर है, बहुत जानदार कथा। ” प्यारा शोर”, बहुत ही व्यवहारिक तथ्यों पर आधारित है। मैं हर लघुकथा स्पष्ट नहीं कर सकती, पुस्तक मंगवाएं और पढ़ें…बिल्कुल पैसा वसूल जैसा विश्वास आएगा। “अहं पर चोट” ,” सूत्र वाक्य”, ‘इसलिए कहा था’, ‘समझने वाली बात’, ‘पुछल्ला’, … सहज रूप से मन के करीब लगने वाली लघुकथाएँ है। वाकई यह सीखने की बात है कि घरों में अक्सर घटने वाली बातें किस तरह लघुकथा में ढल गयी हैं।
लघुकथाकारों को अक्सर विषयवस्तु नहीं मिलते, यह पुस्तक उन्हें बताएगी कि विषय कैसे लिया जाता है। मैं लेखक महोदय को उन लघुकथाओं के लिए बधाई प्रेषित करती हूँ। ‘अलिखित शर्त’ में हिट एंड रन केस को बखूबी पिरोया गया है। ‘पसंदीदा चक्कर’ संयुक्त परिवार के बारे में कहती सुन्दर कथा है।
अब आगे की कथाओं की जिज्ञासा को जिज्ञासा ही रहने देती हूँ। आप सभी यह पुस्तक अवश्य पढ़ें। लघुकथा विधा को ऊँचाई तक पहुंचाती सार्थक, गहन पुस्तक है। आगे भी सुपेकर जी की नई पुस्तकें प्रकाशित हों , इसके लिए बहुत शुभकामनाएं ।
पुस्तक – सातवें पन्ने की खबर
लेखक – सन्तोष सुपेकर
प्रकाशक – अक्षरविन्यास, उज्जैन
पृष्ठ – 126
मूल्य – 300/-
समीक्षाकार – ऋता शेखर ‘मधु’, बेंगलुरु

ढाई इंच पर दौड़ती जिंदगी’ का विमोचन 23 अगस्त रविवार को



संतोष सुपेकर के प्रथम उपन्यास का विमोचन आज
उज्जैन।नगर के ख्यात लघुकथाकार, कवि सन्तोष सुपेकर के प्रथम उपन्यास ‘ढाई इंच पर दौड़ती जिंदगी’ का आज 23अगस्त 26 की सायं साढ़े चार बजे प्रेस क्लब (कोठी रोड)में विमोचन संपन्न होगा। कार्यक्रम प्रेमचंद सृजनपीठ और सरल काव्यांजलि के संयुक्त तत्वावधान में होगा।
जानकारी देते हुए प्रेमचंद सृजन पीठ के निदेशक मुकेश जोशी ने बताया कि कार्यक्रम की अध्यक्षता हिन्दी ,मालवी के वरिष्ठ साहित्यकार डॉ.
शिव चौरसिया करेंगे।
मुख्य अतिथि विक्रमादित्य विश्वविद्यालय, उज्जैन कार्य परिषद के वरिष्ठ सदस्य राजेश सिंह कुशवाह होंगे। पुस्तक चर्चा, सारस्वत अतिथि, ख्यात समालोचक एवं कुलानुशासक डॉ. शैलेन्द्र कुमार शर्मा करेंगे। विशिष्ट अतिथि ख्यात कहानीकार ,समालोचक मनीष वैद्य ( देवास) तथा मनीष शर्मा (देवास) होंगे।
कार्यक्रम के सूत्रधार डॉ हरीश कुमार सिंह होंगे।
प्रेमचंद सृजन पीठ एवं सरल काव्यांजलि ने नगर के साहित्यिक एवं सुधिजनों से आयोजन में पधारने का अनुरोध किया है।

नट सम्राट संगीतसुर्य केशवराव भोसले जयंती मनाई



उज्जैन। प्रसिद्ध नाटककार संगीत सूर्य केशवराव भोसले की 136वीं जयंती सेवा भारती बालिका छात्रावास की बालिकाओं के साथ धूमधाम से मनाई गई। इस अवसर पर छात्रावास की बालिकाओं द्वारा समूह गीत, नृत्य ,नाटक, योग प्रदर्शन, दंड प्रस्तुति एवं गीता के बारहवें अध्याय का पाठ किया गया। बालिकाओं ने विभिन्न प्रतियोगिता में सहभागिता कर अपनी कला का उत्तम प्रदर्शन किया। कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में प्रसिद्ध नाटककार दुर्गेश बाली ने अपने उद्बोधन में कहा कि नाटक यह एक ऐसी कला है जो दृश्य -श्रव्य माध्यम से दर्शकों के हृदय तक पहुँच जाती है। संगीत सूर्य केशवराव भोसले ने अपना सारा जीवन संगीत नाटक को समर्पित किया। सर्वप्रथम उन्होंने ही संगीत नाटक के परंपरा को लोगों के सामने प्रस्तुत किया। हमारा जीवन एक नाटक की तरह ही है। इसमें हम हर तरह की भूमिका निभाते हैं। विद्यार्थियों ने इस विधा में भाग लेकर अपनी सृजनशीलता का परिचय देना चाहिए। मानसिंह शरद ने कहा की छात्राओंको संगीत, नाट्य, साहित्य, क्रीड़ा क्षेत्र में रुचि लेकर अपना जीवन समृद्ध बनाना चाहिए़। संगीत सूर्य केशवराव भोसले ने अपने अल्प आयु के जीवन में हमारे सामने आदर्श प्रस्तुत किया है। संगीत सूर्य केशव राव भोसले सामाजिक, संस्कृतिक परिषद मध्य प्रदेश प्रान्त की अध्यक्ष डॉ . नेत्रा रावणकर ने वर्तमान के यंत्रयुग में संगीत, साहित्य, नाटक हमें तनाव रहित होकर जीवन जीने की कला सिखाते हैं, तथा हमारे बहुआयामी व्यक्तित्व निर्माण में किस प्रकार सहायक होते हैं, बताया। कार्यक्रम का सफल संचालन छात्रावास की बालिकाओं द्वारा किया गया। आभार प्रदर्शन श्रीमती अंजलि वैशम्पायन ने किया। कार्यक्रम में अशोक रावणकर ,प्रीति तेलंग , पद्मा कुबे, टीना सोलंकी,विजेता शर्मा उपस्थित रही। स्पर्धा में उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए सभी छात्राओं को पुरस्कृत किया गया।

संपादक की कलम से – राजेंद्र देवधरे ‘दर्पण’



रक्षाबंधन हमारी संस्कृति का एक ऐसा पर्व है जो भाई-बहन के रिश्ते को हमेशा जीवंत बनाए रखता है। कच्चे धागों वाला यह ऐसा त्योहार है जो भाई एवं बहन के रिश्ते को और मजबूती से बांधता है। आज के दिन बहन अपने भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधकर उसके सुखी, सफल और दीर्घायु जीवन की कामना करती है, तो भाई भी उसकी रक्षा का वचन देता है। आइए आज इस पवित्र पर्व पर हम यह कामना करें कि देश की बहन-बेटियाँ सुरक्षित और खुशहाल रहें एवं इतनी उन्नति करें हर क्षेत्र में देश का मान बढ़ाएं।
तक्षित साहित्य सुधा के समस्त कवि, लेखक एवं पाठकों को रक्षा बंधन के पवित्र पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं। बाबा महाकाल सभी को स्वस्थ एवं प्रसन्न रखें।

Dr. Sanjay Nagar

Author & Co-Founder Takshit News

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