साहित्य

तक्षित साहित्य के इस अंक में आनंद लीजिये उत्कृष्ट रचनाओं का

 

नेपाल में पानी का तांडव

 रचनाकार-कवि प्राण “प्रहरी” गुना (मध्य प्रदेश)

प्रकृति हो गई भयावह जो कहर ढा गयी!

आई पानी की लहर शहर के शहर का गयी !!

देखे विनाश लीला हम दिल दहला देने वाली ! सावधान ओ! मानव खुद को ना समझो बलशाली !! प्रकृति अपनी ताकत का असर दिखा गयी!!!

आई पानी की लहर शहर के शहर खा गयी…. (1)

पल भर में शहर शमशान बने बस ! लाशों का अंबार ! समझ रे! मानव होती ऐसी प्रकृति की मार !!

मौत का तांडव नाच किस कदर दिखा गयी !!!

आई पानी की लहर शहर के शहर खा गयी…….. (2)

वैज्ञानिक अराजकता को जोर से ललकारा !

बनाकर भेजा पानी को प्रकृति ने हरकारा !!

पानी लहर कुनामी हरकत दिखा गयी!!!

आई पानी लहर शहर के शहर खा गयी….. (3)

कितना कुछ भी कर ले कुदरत हार न हम मानेंगे! उजड़ गए घरवार बसाने की फिर हम ठानेंगे !!

 “प्रहरी “समय से संभल जाएं यह सबक सिखा गई !!!

आई पानी की लहर शहर के शहर खा गयी……. (4)

हाइकु 

अशोक आनन,मक्सी 

जल प्रहार

बारिश कर रही

जन संहार ।

हिंसा का दौर

मानवता घायल

है चहुंओर ।

पैरों के तले

मसल दिए फूल

शूलों के लिए ।

सोच बदलो

जीवन फिसलन

यूं न फिसलो ।

आये न चैन

ऑंतें कुलबुलातीं

टपकें नैन ।

खोल सांकल

पोतकर कालिख

आये बादल ।

सावन झूले

वो मुक्का गुड़ धानी

ये बच्चे भूले ।

मैं नारी हूँ

उर्मि शर्मा

मैं नारी हूँ

प्रेम मेरी ऊर्जा है

कर्तव्य और प्यार से परिपूरित है

मेरा सौन्दर्य

जिन दो नयनों से

मैं प्रेम बांटती हूँ

वही मेरी जिव्हा है

जिनमें प्रणव और पीड़ा

दोनों की अभिव्यक्ति है

क्योंकि न प्रेम छुपता है न पीड़ा

प्रेम जीना सिखाता है

तो पीड़ा प्रेम करना

इस पर भी यदि विरहाग्नि न हो

तो नहीं कटती है

इन्तजार की घड़ियां

और फिर प्रिय का इंतजार भी तो

मेरी ऊर्जा है

इसलिए भी तो मैं नारी हूँ।

ग़ज़ल 

-कमलेश व्यास ‘कमल’

काठ की या फूस की छत कौन जाने

कौन किसकी है ज़रूरत कौन जाने।

शब्द कांटे शूल ख़ंजर सह चुके पर

घाव कितना दे हरारत कौन जाने।

रंक से राजा बना दे एक पल में

कौन करता है ये हरकत कौन जाने।

आ गई बाज़ार से ये घर तलक तो

अब कहाँ पहुँचे तिज़ारत कौन जाने।

एक दूजे पे भरोसा प्यार सच्चा

कब तलक है ये सलामत कौन जाने।

कर दिया दोज़ख सियासत ने थी ज़न्नत

कब मिटेगी ये अदावत कौन जाने।

इस जहाँ को एक करना चाहता हूँ

कब मिलेगी ये इज़ाज़त कौन जाने।

शहर बढ़ रहे हैं 

अमृता उषारिया

शहर बढ़ रहे हैं

सुरसा के मुंह की तरह

निगलते —-

पेड़, जंगल,

धान उपजाते किसान

और

बदले में उगलते

मुवावजा गिनते व्यापारी

और —-

सूखा रेगिस्तान…।


मैं हिंदी प्राध्यापक का बेटा,

वो गणित अध्यापिका की बेटी- सौरभ चातक

जिसे देखा, तो तन ने कही मन की नीति –

“इस सूत्र को हल करना ही मेरी नियति!”

परिस्थिति विषम, पर मैं प्रेम में सम,

लिख दिया एक वर्गाकार कागज पर…

अपने हृदय का प्रथम प्रमेय,

जहाँ प्रश्न भी मैं था, और उत्तर भी मैं।

मैंने लिखा—

“तुम मेरी पूर्णांक, तुम ही मेरा योग,

तुम ही मेरी ऊँचाई, तुम ही मेरा भोग।

तुम ही मेरी त्रिज्या, तुम ही मेरी सारणी,

तुम बिन अधूरी मेरी समकोण त्रिभुज की कहानी!”

हमारे-तुम्हारे बीच कुछ ऐसा हो जाए,

ताकि प्रेम का समकोण बन जाए,

कुछ तुम ऐसा मानक योग करो,

मुझे अपने गुणनखंड में रखकर, हमेशा सार्थक फलन करो।

यदि तुम भाज्य, तो मैं तुम्हारा भाजक,

यदि तुम द्रव्य, तो मैं तुम्हारा आकर्षक,

यदि तुम वृत्त, तो मैं तुम्हारी त्रिज्या,

यदि तुम प्रमेय, तो मैं तुम्हारा सिद्धांत।

बस इतना सुनिश्चित कर दो—

हमारा प्यार अनंत हो,

इसमें वर्ग करो, तो लाभ भाज्य हो,

उत्तर हमेशा अखंड, अविभाज्य हो!

उसने भी एक मिनट के चौथे हिस्से में मेरा मूल्यांकन किया,

और उत्तर में लिखा—

“तुम मेरे जीवन के सूत्र, तुम ही मेरे बीजगणित,

तुमसे ही मेरी संख्या सार्थक, तुमसे ही मेरे अंक सुसज्जित!”

परंतु…

जब तक तुम मेरे क्षेत्रफल में पूरक रहोगे,

हमारे प्रेम के आयाम में गुणोत्तर वृद्धि होगी।

जिसके लाभांश से हम बहुलक होकर,

इकाई-दहाई मिलाकर मिश्रित संख्या बनाएंगे।

तुम भाजक बनना, मैं तुमसे विभाज्य हो जाऊँगी,

शत-प्रतिशत प्रायिकता से तुम्हारी हो जाऊँगी।

पर इससे पहले कि मैं इस पत्र को संचय करता,

वो उसके माता-पिता के हाथ लग गया,

और मेरे चरित्र का विवरण हो गया।

फिर उसके पिताजी ने शंकु रूप धारण किया,

और मेरे कर्ण पर बहुभुज की शक्ति से प्रहार किया!

मुझे हिदायत दी—

“भूल जाओगे प्रेम की सारी आयत,

जब मैं तुम्हारे मूल बीजक से कर दूंगा शिकायत!”

पर मैंने भी प्रतिलोम परिस्थिति में अपने प्रेम को रखा उत्कर्ष,

और निकाला निष्कर्ष—

“जीवन ग्राफ में अंतिम बिंदु तक तुमने साथ दिया,

तो प्राप्तांक होगा हर्ष!”

इसलिए मैंने फिर उसे प्रेम का पाइथागोरस प्रमेय लिखा—

“मेरी प्यारी थीटा-बीटा,

भले ही तुम्हारे पिताजी ने मुझको पीटा,

फिर भी मेरा तुम्हारे प्रति नहीं बदला कोण।

तुम मेरे दिल के कोष्ठक में बनके रहो समकोण!”

प्रेम इन्फिनिटी है,

इसमें गुणा करो या स्क्वेयर करो, ग्राफ बढ़ेगा।

हमेशा अनुपातिक रूप से गुणनफल का प्रेम बढ़ेगा!

उसने भी लिखा—

“मैं तुम्हारे विश्लेषण, उपमा, विशेषण से प्रभावित हूँ,

सौ प्रतिशत समानुपातिक रूप से सिर्फ तुम्हारी हूँ।

अब हमारे बीच कोई ‘भेद’ नहीं होगा,

हमारा ‘संधि-विच्छेद’ नहीं होगा!”

बस प्यार में हम उपसर्ग, और प्रत्यय बन जाएंगे।

हम संधि-क्रिया बनकर रस-छंद में बह जाएँगे।

हमारे प्रेम गद्य-पद्य का विन्यास होगा,

ना कथा, ना कहानी,

ये बस प्रेम का उपन्यास होगा।

‘हिंदी’ में प्रेम का ‘गणित’ हो या

‘गणित’ में प्रेम की ‘हिंदी’,

‘इतिहास’ गवाह है।

प्रेम की ‘नीति’ होती है, प्रेम में ‘राजनीति’ नहीं,

जो भी ‘भूगोल’ में प्रेम से जुड़ा,

‘भौतिक’ रूप से ‘रसायन शास्त्र’ में डूबा,

उसने ही नया ‘समाजशास्त्र’ गढ़ा है।

इसलिए कहता हूँ—

“जीवन में सिर्फ प्रेम का ‘अर्थ’ सबसे बड़ा है,

और जिसने प्रेम पा लिया, वही समर्थ है।

बाकी सब व्यर्थ है… बाकी सब व्यर्थ है!”


स्त्री का मन

 संगीता तल्लेरा

एक स्त्री का मन।

नदी की अथाह गहराई-सा

जिसकी तलहटी तक पहुँचना आसान नहीं।

वृक्ष की जड़ों-सा विस्तृत

जो धरती में दूर-दूर तक फैला रहता है।

समुद्र में  सीप-सा शांत,

पर भीतर अनगिनत ज्वार समेटे हुए।

विशाल आकाश-सा अनंत

जिसके भावों की कोई सीमा नहीं।

कभी ममता की निर्मल धारा

कभी साहस का अडिग पर्वत।

कभी चुप्पी में सिमटा संसार

कभी शब्दों से परे एक पुकार।

कोई नहीं समझ सकता

एक स्त्री का मन

क्योंकि उसमें बसता है

सृजन, समर्पण, प्रेम और संघर्ष का

पूरा एक ब्रह्मांड।

लघुकथा :             

  भिखारी

 आशागंगा प्रमोद शिरढोणकर 

   “पेन नहीं जेब में, पर मोबाइल पचास हज़ार का लेकर घूमते हैं। मैं ऐसे नौजवानों को कभी पेन नहीं देता‌।”

          टेलीफोन बिल भरने की लाइन में लगते- लगते एक बुज़ुर्ग का आक्रोशभरा स्वर मेरे कानों में पड़ा। वे पास में खड़े एक दूसरे बुज़ुर्ग को अपना पेन देते-देते मेरी ओर भी समर्थन की आशा से निहारने लगे।

           मैंने उन्हें निराश नहीं किया, “पेन तो पाँच रुपये में भी मिलता है अंकल।”

          “वही तो ! एक लाख की मोटरसाइकिल, पचास हजार का मोबाइल, दस हजार की जींस, पाँच हजार की ब्रांडेड टी-शर्ट, उससे भी ज्यादा के जूते, पर नहीं है तो केवल पाँच रुपये वाला पेन नहीं है। ऐसे नौजवानों की यही सजा है।” उन्होंने अपना ज्ञान उजागर किया।

         “जी अंकल, औपचारिकतावश कभी पेन दे भी दिया, तो उस व्यक्ति पर नज़र रखने का टेंशन कि कहीं बिना पेन लौटाए खिसक न जाए।”  पेन उन्हें दिखाते हुए मैंने कहा, “इसीलिए पेन से वंचित निर्धनों के लिए मैं हमेशा पाँच रुपये वाला एक पेन भी अपने पर्स में रखती हूँ।”

मिच्छामी दुक्कडम

कमल आंजना पटेल

गांव -चकरावदा

कच्ची मिट्टी के पुतले हैं भगवन।

सो, अनजानी गलतियां कर देते हम।।

हृदय दुखाया जो मैंने किसी का।

अंतरमन से मिच्छामी दुक्कडम।।

क्षमा बड़न को चाहिए, छोटन के उतपात।

काव्य मनिषी कह गए, सदियों पहले बात।।

उत्तम क्षमा मंत्र से हृदय से भार होता कम।

अंतरमन से कहता हूं मिच्छामी दुक्कडम।।

पर्युषण पर्व देता प्रतिवर्ष ये संदेश महान।

हर इक प्राणी का रखना चाहिए ध्यान।।

प्राणी मात्र से क्षमा चाहता हूं मैं अधम।

अंतर्मन से कहता हूं

Dr. Sanjay Nagar

Author & Co-Founder Takshit News

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