तक्षित साहित्य धारा

डिजिटल युग में खोती मानसिक शांति

विश्व मानसिक स्वास्थ्य दिवस पर विशेष

श्रीमती सुमन नागर

डिजिटल युग की चमक के बीच खोती मानसिक शांति, बढ़ती प्रतिस्पर्धा और बदलती जीवनशैली ने मानसिक स्वास्थ्य को गंभीर चिंतन का विषय बना दिया है।
आज की एआई और डिजिटल दुनिया में मन को स्वस्थ बनाए रखना एक चिंतनीय और विचारणीय प्रश्न बन गया है। पिछले एक दशक में जीवनशैली और सामाजिक व्यवहार में आए बदलाव इस बात की ओर संकेत करते हैं कि बच्चे हों या बुजुर्ग, युवा हों या प्रौढ़—तनाव का प्रभाव लगभग हर आयु वर्ग पर दिखाई देने लगा है। शारीरिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता तो बढ़ी है, लेकिन मानसिक स्वास्थ्य आज भी अपेक्षित प्राथमिकता प्राप्त नहीं कर पाया है।
मोबाइल और सोशल मीडिया का बढ़ता प्रभाव
मोबाइल और सोशल मीडिया की घर-घर में पहुँच ने जीवन को सुविधाजनक अवश्य बनाया है, लेकिन इसके दुष्प्रभाव भी कम नहीं हैं। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि जिंदगी आसान हुई है, लेकिन जीवन की सहजता कहीं खोती जा रही है।
डिजिटल युग के दुष्प्रभाव हर स्तर पर दिखाई देने लगे हैं। बच्चे, युवा और बुजुर्ग, सभी मोबाइल की आभासी दुनिया में अधिक समय बिताने लगे हैं। आमने-सामने बैठकर बातचीत करने, सामाजिक संबंधों को निभाने और परिवार के साथ समय बिताने की प्रवृत्ति कमजोर पड़ रही है। व्यक्ति की दुनिया धीरे-धीरे स्क्रीन तक सिमटती जा रही है।
सोशल मीडिया पर प्रस्तुत आकर्षक तस्वीरें, जीवनशैली और सफलता के कथित मानदंड व्यक्ति की सोच, व्यवहार और आत्ममूल्यांकन को प्रभावित करते हैं। दूसरों के जीवन से अपनी तुलना करने की प्रवृत्ति हीनभावना, असंतोष और तनाव को जन्म दे सकती है। स्क्रीन टाइम की अधिकता, नींद में कमी और सामाजिक गतिविधियों से दूरी मानसिक स्वास्थ्य के लिए चुनौती बन रही है।
प्रतिस्पर्धा की अंधी दौड़
वर्तमान समय प्रतिस्पर्धा का युग है। हर व्यक्ति दूसरे से आगे निकलने की होड़ में लगा है। सफलता प्राप्त करने की आकांक्षा स्वाभाविक है, लेकिन जब यह आकांक्षा स्वास्थ्य और मानसिक शांति की कीमत पर पूरी की जाने लगे, तब चिंता उत्पन्न होती है।
दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि प्रतिस्पर्धा का दबाव अब छोटे बच्चों तक पहुँच गया है। पाँच वर्ष की आयु के बच्चों से भी माता-पिता अपेक्षा करने लगते हैं कि वे पढ़ाई और अन्य गतिविधियों में अपने सभी सहपाठियों से आगे रहें। बचपन, जो खेल, जिज्ञासा और सहज विकास का समय है, अनावश्यक अपेक्षाओं और दबाव में घिरने लगता है। निरंतर तनाव का यह वातावरण बच्चों के भावनात्मक विकास को प्रभावित कर सकता है।
अनियमित दिनचर्या और बिगड़ता मानसिक स्वास्थ्य
स्वस्थ जीवन के लिए नियमित दिनचर्या का विशेष महत्व है। देर रात तक जागना, सुबह देर से उठना, पर्याप्त नींद न लेना और भोजन के समय में अनियमितता आधुनिक जीवनशैली का हिस्सा बनते जा रहे हैं।
शरीर और मन का गहरा संबंध है। पर्याप्त नींद, संतुलित आहार और नियमित शारीरिक गतिविधि मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाए रखने में सहायक हैं। इसके विपरीत, लंबे समय तक अनियमित दिनचर्या तनाव, चिड़चिड़ेपन और एकाग्रता में कमी जैसी समस्याओं को बढ़ा सकती है। इसलिए दिनचर्या में संतुलन स्थापित करना समय की आवश्यकता है।
प्रकृति से बढ़ती दूरी
वर्तमान परिवेश में सीमेंट-कंक्रीट के जंगल, सीमित खुली जगहें, छोटे फ्लैट और लगातार बढ़ता शोर हमारे जीवन का हिस्सा बन गए हैं। प्रकृति की गोद में समय बिताने, खुले वातावरण में विचरण करने और हरियाली के बीच कुछ पल शांत रहने के अवसर कम होते जा रहे हैं।
प्राकृतिक वातावरण से जुड़ाव, नियमित सैर और खुली हवा में समय बिताना तनाव कम करने तथा मन को सुकून देने में सहायक हो सकता है। प्रकृति से दूरी और शोरगुल भरे वातावरण के बीच लगातार रहने से मानसिक थकान बढ़ सकती है। ऐसे में जीवन में प्रकृति के लिए स्थान बनाना आवश्यक है।
एकल परिवार और भावनात्मक अकेलापन
पिछले दो दशकों में एकल परिवारों की प्रवृत्ति बढ़ी है। रोजगार, शिक्षा और अन्य परिस्थितियों के कारण संयुक्त परिवारों से दूर रहना अनेक लोगों की आवश्यकता बन गया है। एकल परिवार अपने आप में मानसिक तनाव का कारण नहीं है, लेकिन जब परिवार के सदस्यों के बीच संवाद कम हो जाए और भावनात्मक सहयोग का अभाव हो, तब अकेलेपन की समस्या गंभीर हो सकती है।
बुजुर्गों का अकेलापन, बच्चों का सीमित सामाजिक संपर्क और कामकाजी लोगों का निरंतर दबाव परिवार के भीतर संवाद और अपनत्व की आवश्यकता को रेखांकित करता है। परिवार केवल साथ रहने का नाम नहीं, बल्कि एक-दूसरे को सुनने, समझने और भावनात्मक संबल देने का माध्यम भी है।
अपेक्षाओं का बोझ और मानसिक तनाव
जीवन में अपेक्षाएँ रखना स्वाभाविक है, लेकिन जब हम दूसरों से अपनी इच्छाओं के अनुरूप व्यवहार की उम्मीद करने लगते हैं, तब निराशा की संभावनाएँ बढ़ जाती हैं। सामने वाला व्यक्ति जब हमारी अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरता, तो मन में असंतोष, शिकायत और तनाव जन्म लेने लगता है।
दूसरों से अपेक्षाएँ रखने के साथ-साथ उनकी परिस्थितियों, सीमाओं और स्वतंत्र विचारों को समझना भी आवश्यक है। हर व्यक्ति का स्वभाव, सोच और जीवन जीने का तरीका अलग होता है। इसलिए दूसरों को अपनी इच्छानुसार बदलने के बजाय अपनी अपेक्षाओं को संतुलित करना मानसिक शांति की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।
मानसिक स्वास्थ्य के लिए जीवन में संतुलन जरूरी
मानसिक स्वास्थ्य केवल बीमारी का अभाव नहीं, बल्कि भावनात्मक, सामाजिक और मनोवैज्ञानिक रूप से स्वस्थ रहने की अवस्था भी है। इसके लिए मोबाइल और सोशल मीडिया का विवेकपूर्ण उपयोग, नियमित दिनचर्या, पर्याप्त नींद, व्यायाम, प्रकृति से जुड़ाव और परिवार के साथ संवाद आवश्यक हैं।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि मानसिक तनाव को कमजोरी समझकर छिपाया नहीं जाना चाहिए। यदि तनाव, उदासी, घबराहट या नींद की परेशानी लंबे समय तक बनी रहे और दैनिक जीवन प्रभावित होने लगे, तो योग्य मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से परामर्श लेने में संकोच नहीं करना चाहिए।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम सफलता की दौड़ में अपने मन की शांति को पीछे न छोड़ें। स्वस्थ शरीर के साथ स्वस्थ मन भी जीवन की अनिवार्य आवश्यकता है। आखिरकार, जीवन की वास्तविक समृद्धि केवल भौतिक सुविधाओं में नहीं, बल्कि मन की शांति, संबंधों की आत्मीयता और विचारों की सकारात्मकता में निहित है।
क्योंकि स्वस्थ तन में ही स्वस्थ मन का निवास होता है और स्वस्थ मन ही सुखी, संतुलित एवं सार्थक जीवन का आधार है।

Dr. Sanjay Nagar

Author & Co-Founder Takshit News

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