आत्म जागरण का पर्व: नवरात्रि

डॉ.नेत्रा रावणकर , उज्जैन
वैदिक साहित्य और सनातन परंपरा में नवरात्रि एवं देवी आराधना के मूल प्रमाण छिपे है। ऋग्वेद के दसवे मंडल 125 वा सूक्त -देवी सूक्त है, इसके अनुसार वाक् देवी में सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की उर्जा शक्ति और सत्ता निहित है। वह वसुओं, रुद्रो, आदित्यों और सभी देवताओं को धारण करती है, वही समस्त जगत की प्राण शक्ति और सृजन का मूल आधार है। ‘नवरात्रि’ का विशेष संबंध ‘रात्रि पूजन’ से होता है ।रात्रि सूक्त में रात्रि को जगत की संचालिका, अंधकार को दूर करने वाली और साधकों को मुक्ति देने वाली महाशक्ति माना गया है। यजुर्वेद में इसे दुर्गा तो अथर्ववेद मातृसत्ता प्रकृति की देवी कहा है। वेदों में जिस पराशक्ति या वाक्शक्ति को सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की चेतना कहा गया है वही तात्विक रूप से महाशक्ति, महाकाली और महासरस्वती के रूप में पल्लवित हुआ जिसे हम ‘नवरात्रि’ कहते है।
यह समय चैत्र और अश्विन मास के संधिकाल का होने से ऋतुओं के परिवर्तन का रहता है ,इसे साधना के लिए अत्यन्त महत्वपूर्ण माना गया है, मौसम और शरीर की उर्जा में होने वाले बदलाव के संतुलन के लिए वैदिक काल से ही उपवास, संयम और आत्म- अनुशासन का विधान रही है।
गीता के सोलहवे अध्याय में जिन दैवीय गुणों (अभय, शूचिता, दान, संयम, अहिंसा, सत्य, करूणा आदि) को अपनाने और आसुरी स्वभाव (काम, क्रोध, लोभ, अहंकार) का त्याग करने का संदेश दिया गया है ,वही नवरात्रि के व्रत, संयम और साधना का वास्तविक आंतरिक उद्येश्य है।
भारतीय दर्शन में शक्ति को सृष्टि की मूल उर्जा माना गया है। शक्ति के बिना शिव भी निष्क्रिय माने गये है। माँ दुर्गा इसी आदि शक्ति का प्रतीक है। उनका स्वरूप हमे यह संदेश देता है कि जब जीवन में अन्याय, अज्ञान, अहंकार और नकारात्मकता का विस्तार होता है, तब उनका सामना करने के लिए विवेक, साहस और सामर्थ्य की आवश्यकता होती है।
आत्मशक्ति वह आंतरिक सामर्थ्य है, जिसके आधार पर मनुष्य कठिन परिस्थितियों में भी अपने विवेक को बनाए रखता है। जब परिस्थितियां
विपरित हो तब भी अपने आंतरिक बल को हटाकर आशावादी बनकर संघर्ष करता है । मॉं दुर्गा के नौ स्वरूप , नौ दिन, नौ रात्रि हमें माँ शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघण्टा, कूष्मांडा, स्कन्दमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी, सिद्धिदात्री देवीयों के नौ स्वरूपों को परिचित करवाते है। बाहरी अनुष्ठानों सेअधिक मन की आंतरिक साधना को प्रबल बनाने के लिए मदद करती है। जप, ध्यान, उपवास, प्रार्थना के साथ इन दिनों में हम अपना आत्मचिंतन करे, कमियों को दूर करने का प्रयास करें। हमारे व्यक्तित्व को कमजोर भीकरने वाले अवगुणों को हावी न होने दे। आत्मशुद्धि की दिशा में इसप्रकार ठोस प्रयास भीतर की नकारात्मकता दूर कर हमे सार्थक रूप से सकारात्मक बनाते है।
‘नवरात्रि’ नारी सम्मान का पर्व है। उन्हें पूज्य बनाने के उद्येश्य से शिक्षा, स्वास्थ्य ,सुरक्षा, सम्मान में समान अवसर प्रदान करने होंगे। राष्ट्र की आधी आबादी का सशक्तिकरण उनमें आत्मनिर्भरता ,आत्मविश्वास का संचार करने से ही साध्य होगा।
नवरात्रि का पावन पर्व केवल बाहरी पूजा अनुष्ठान करना नही परंतु ‘अप दीपो भव’ “अपना दीपक स्वंय बनो “का उपदेश देता है। यह उत्सव
हमारी इच्छाशक्ति , क्रियाशक्ति, ज्ञानशक्ति से प्रकाशित होने का अवसर प्रदान करता है।जिस प्रकार नवरात्रि में घटस्थापना कर कलश पर रखा दीपक निरंतर जलता रहता है। नवरात्रि में बोए जाने वाले ज्वारे के रूप में अन्नरूपी ब्रह्म की पूजा तथा सम्पूर्ण प्रकृति और जगत का पालन पेाषण करने वाली माँ अन्नपूर्णा के प्रति हम आभार प्रकट करते है। मिट्टी का बर्तन हमारे शरीर का प्रतीक है। मिट्टी हमारी मन: स्थिति है, बीज हमारे कर्म एवं संकल्प है ,जब हरे-हरे ज्वारे उग आते है तब हमारे भीतर के सकारात्मक विचार एवं उर्जा का विस्तार होता है अंत में उसे विसर्जित करना प्रकृति का चक्र है । इससे हमें जीवन की नश्वरता और अनासक्ति का संदेश भी प्राप्त होता है। इस प्रकार नवरात्रि आत्मशक्ति के परिचय आत्मविश्वास का जागरण और अपने भीतर विद्यमान दिव्यता की अनुभूति को पहचानने का पर्व है।
