
कितने मौकों पर नहीं, झुके हमारे शीश।
फिर भी माँ देतीं रही,सदा हमें आशीष।।
माँ होती संतान की,पूँजी अति अनमोल।
थी तब तो बोले नहीं,तरसी मीठे बोल।।
रहती माँ के दूध में,सब बच्चों की जान।
पशु मानव को दे रहा,अब जीवन का ज्ञान।।
सागर मंथन-सा मथा,जब देवों ने प्यार।
माँ के दिल में रख दिया,उस मंथन का सार।।
माँ पूँजी अनमोल है,सर्वोत्तम आधार।
माँ सृष्टि का उदगम है,माँ ही तारणहार।।
माँ बच्चों की प्रथम गुरु,शिक्षा का संस्कार।
विविध रूप औ’ वेष में,माँ ही पालनहार।।
पिघला दे पाषाण को,माँ की करुण पुकार।
माँ ही रक्षा सूत्र है,माँ संकट संहार।।
बाधाओं को पार कर,करना ही है कर्म।
पेट जना ले पीठ पर,निभा रही माँ धर्म।।
तुलसी माता आप हैं,भारत की पहचान।
विश्वपूजिता आपका,कैसे करूँ बखान।
विश्वपावनी नन्दिनी,कृष्ण जीवनी मात।
हे माँ वृंदा आप हैं,ईश्वरीय सौगात।।
