तक्षित न्यूज़ की प्रस्तुति तक्षित साहित्य धारा,साहित्य संपादक राजेंद्र देवधरे ‘दर्पण’


10 अगस्त (सोमवार) – विश्व शेर दिवस (World Lion Day)
12 अगस्त (बुधवार) – अंतरराष्ट्रीय युवा दिवस (International Youth Day)
13 अगस्त (गुरुवार) – विश्व अंगदान दिवस (World Organ Donation Day)
15 अगस्त (शनिवार) – भारत का स्वतंत्रता दिवस
16 अगस्त (रविवार) – अटल बिहारी वाजपेयी पुण्यतिथि
रिश्तों में बराबरी चाहिए या बराबरी में रिश्ते?
दीपिका मानवानी
बालासिनोर (गुजरात)

रिश्तों में बराबरी चाहिए या बराबरी में रिश्ते?
बराबरी में रिश्ते चाहे ना हो किन्तु रिश्तों में बराबरी आवश्यक है। बराबरी सम्मान की और प्यार की होनी चाहिए। पैसों से रिश्तों को तौलना कभी समझदारी नहीं है क्योंकि वो तो आने जाने हैं। सम्मान और प्यार जितना हमें चाहिए उतना ही सबको। अतः रिश्तों में बराबरी का भाव आवश्यक है चाहे छोटा हो बड़ा हो, या फिर स्त्री-पुरुष सभी का हक समान है।
अनुगामी या सहगामी
पत्नी अनुगामी हो या सहगामी , दोनों ही बातों में फर्क है। सहगामी होकर भी पत्नी अपने फर्ज से पीछे नहीं हटती तो अनुगामी पत्नी भी अपना धर्म हर हाल में निभाती है। फर्क पड़ता है पुरुष के जीवन पर, अनुगामी पत्नी होने पर उसके जीवन में एक सच्चे दोस्त की कमी सदैव बनी रहती है तो वहीं सहगामी पत्नी उसकी सच्ची दोस्त भी है और सलाहकार भी । यह पुरुष को तय करना है कि उसे अपनी पत्नी में क्या आवश्यक गुण हैं जिन्हें वो अपनी जिंदगी में अपनाना चाहता है।
पत्नी साधन मात्र नहीं
पत्नी न तो घर के कामकाज का साधन है ना ही मनोरंजन का, यदि कुछ है तो पुरुष के अधूरे जीवन को पूरा करने वाला आवश्यक हिस्सा है वह। जो पति के कंधे से कंधा मिलाकर चलती है उसके बेहतर भविष्य व वर्चस्व को बढ़ाने के लिए। यह वो संबंध है जिसमें दो आत्माएँ जिंदगी भर के लिए एक होकर जीवन के गौरव का अनुभव करती हैं। वरना तो जीवन बोझ ही लगता है। अकेलापन उस व्यक्ति को सदैव निराशा देता है चाहे वह शादीशुदा ही क्यों न हो , जिसका कारण सिर्फ यही हो सकता है कि उसने कभी पत्नी को अपनी सहचरी माना ही न हो।
अपनी भूल सुधार ले, रख अनन्य तू भाव।
कोई नहीं ज्येष्ठ यहाँ, मत कुरेद तू घाव।।
नर्मदेहर
राम शर्मा ‘परिंदा,
मनावर जिला धार
मो.7869196304

बुद्धि हो जाये प्रखर
छू ले हम हर शिखर
हे ! मात नर्मदे – –
तू नर के मद को हर ।।
झूके कहीं न सर
बन जायें हम निडर
सच का हम साथ दे
झूठ का छोड़े हर दर
हे ! मात नर्मदे – – –
तू नर के मद को हर ।।
ध्यान करें हर प्रहर
गाँव हो या हो शहर
भक्ति रस धार बहे
समंदर लहर-लहर
हे ! मात नर्मदे – – –
तू नर के मद को हर।।
निर्विघ्न हो हर सफर
मंजिल पर हो नजर
राह की बाधाओं की
सबको रहे खबर
हे ! मात नर्मदे – – –
तू नर के मद को हर ।।
घना हो हर एक शजर
‘परिंदा’ का बने वह घर
सुख-चैन से जीयें सभी
दूर हो जाये हर कहर
हे ! मात नर्मदे – – – – – –
तू नर के मद को हर ।।
सोशल मीडिया का जाल
नंदकिशोर पांचाल, उज्जैन

मोबाईल है हाथों में सोशल मीडिया का जाल है।
फेसबुक पर खाता है,पर पैसों से कंगाल है।।
दादी-नानी के किस्से, अब लगे पुरानी बात है।
लेपटॉप और कम्प्यूटर की,मिल गई जो सौगात है।।
तो कंकड़-पत्थर नहीं चुभेंगे,अब गौरी के पांव में।
पैर पसारे आधुनिकता,आ गई अब तो गांव में।।
अंग्रेजी हो या फिर देसी,कवेलू हो गए गायब हैं।
आर सी सी की छत में रहते,अब गौरी के सायब हैं।।
सत्रहसौ हैं चेनल घर में,सास-बहू के झगड़े के।
दिन भर चलते कितने नाटक,इक-दूजे से लफड़े के।।
पति बेचारा पिसता रहता,घर की काँव-काँव में।
पैर पसारे आधुनिकता,आ गई अब तो गांव में।।
मैं हूं विश्वधारिणी धरती
डॉ. आर. पी. तिवारी
उज्जैन

मैं हूं विश्वधारिणी धरती
संसृति संतति मेरी
दृढ़ा धरा मैं वसुंधरा हूं
पृश्नि धरित्री तेरी
१
मुझमें अनगिन रत्न समाहित
रत्नावती कहाती
एक बीज तुम बो देते मैं
सहस गुना लौटाती
मैं उपजाती प्रचुर अन्न की
लग जाती बहु ढेरी
दृढ़ा धरा मैं वसुंधरा हूं
पृश्नि धरित्री तेरी
२
सरिता निर्झर सागर मुझमें
सब जल श्रोत समाये
जल की धारा जीवन के हित
मैंने तुम्हें पिलाये
निज कर्तव्य निभाने मैं ने
कभी न की है देरी
दृढ़ा धरा मैं वसुंधरा हूं
पृश्नि धरित्री तेरी
३
वृक्ष सभी आभूषण मेरे
मुझको प्यारे लगते
वृक्ष तुम्हारे सदा हितैषी
नहीं किसी को ठगते
वृक्ष काटकर तुमको लगती
मानव प्रकट दिलेरी
दृढ़ा धरा मैं वसुंधरा हूं
पृश्नि धरित्री तेरी
४
मेरी संतति सारी सृष्टी
मुझ पर आश्रय पाती
मनुज जाति कर मेरा अनुचित ,दोहन है सुख पाती
इसीलिए प्राकृतिक आपदा
की बजती रणभेरी
दृढ़ा धरा मैं वसुंधरा हूं
पृश्नि धरित्री तेरी
५
उगते जंगल कंकरीट के
धरती बंजर होती
रोग बाढ़ भूकंप ताप की
तीखी खंजर होती
जल अरु श्वास खरीद रहे हो
दुर्लभ हुई हरेरी
दृढ़ा धरा मैं वसुंधरा हूं
पृश्नि धरित्री तेरी
६
अनुचित सोते रहना जागो
मानो मेरा कहना
यदि ना जागे अबभी निश्चित आधारों का ढहना
अब भी चेतो रहो सुरक्षित
करके रक्षा मेरी
दृढ़ा धरा मैं वसुंधरा हूं
प्रश्नि धरित्री तेरी
बस्ती में लोग दिल के बड़े नही मिले
दीपक पगारे मोहना
गीतकार, सनावद
9826668656

बस्ती में लोग दिल के बड़े नही मिले।
अच्छे के लिए अच्छे खड़े नहीं मिले।।
बिखर गए है मोती माला से टूटकर।
अपनी जड़ों से अब वो जुड़े नहीं मिले।।
नाम शोहरतो के भूखे सभी मिले।
फ़र्ज़ पर मगर कोई अड़े नहीं मिले।।
संस्कार वर्तमान की भेंट चढ़ गए।
उँगली जो बुजुर्गों की पकड़े नहीं मिले।।
जीवन के अर्थ सारे व्यर्थ हो गए ।
जीने के सारे नियम कड़े नहीं मिले।।
छोटी सी अदालत थी, चौपाल गाँव की।
अनुभव के धनी वे बड़े -बूढ़े नहीं मिले ।।
दीपक सदा दुआ करे ,भविष्य में कहीं।
पीढ़ी नई ये गर्त में, पड़े नहीं मिले।
बाट जोह रही है सजनी
..

डा. इसरार मोहम्मद ख़ान,
57/A, पार्श्व कुंज कालोनी,
निकट आलोकनगर, कनाडिया-रोड,
इंदौर म. प्र. 452-016.
मो. 99269 02735
बिरहा के घने अंधेरे में,
दीप जला के आशा का,
बाट जोह रही है सजनी,
प्रियतम के आने की.
माला चमेली की मुरझा गई है,
फूलों में लेकिन गंध अभी शेष है.
नदिया के पार साजन का देश है-
आकुल है मन, तुम बिन सजन.
विधि नहीं कोई तुम्हें पास बुलाने की.
बाट जोह रही है सजनी…
दीप जलाया जो बिरवे पर,
गहन तम में अब भी जल रहा.
आस के प्रकाश में प्यार पल रहा-
हम तुम हैं साथी, जैसे दिया बाती.
ये हैं निजी बातें, जग को नहीं बताने की.
बाट जोह रही है सजनी…
