तक्षित साहित्य धारा
जगह चाहिए…

परमानन्द शर्मा ‘अमन’
घर तो मिल ही जाएगा, दिल में जगह भी चाहिए।
आप क्यों हमसे खफा हैं कुछ वजह भी चाहिए ।।
दर्दे दिल की है निशानी आँसुओं की हर लड़ी,
हार तो हमने सही है अब फ़तह भी चाहिए ।
अब न हो शिकवे, शिकायत अब न हो ऐलाने जंग,
नफरतों के इस जहाँ में हाँ, सुलह भी चाहिए ।
तोड़ देना है दीवारें आज धर्म-ओ-ज़ात की,
हम सफर को एक जैसी ही सतह भी चाहिए ।
शोर गुल क्यों सुन रहा हूँ मैं ‘अमन’ की राह में,
प्रेम की दीवानगी में क्या कलह भी चाहिए ।
