विजयसिंह गेहलोत ‘साकित’

बस दर्द किसी से न कहा, मुस्कुरा दिये। यूँ बार’ ज़िन्दगी का सहा, मुस्कुरा दिये।
किसको दिखाते दिल का आईना, था चूर-चूर, सीने में ये बिखराव रहा, मुस्कुरा दिये।
क़िस्मत की किफ़ायत से, परेशान रहे हैं, अश्कों में न सैलाब बहा, मुस्कुरा दिये।
ख़्वाबों के टूटने की, शिक़ायत भी क्या करें, सपनों का महल जब भी ढहा, मुस्कुरा दिये।
कोई भी किसी का नहीं, रहता तमाम उम्र, गुंचों ने ये भँवरे से कहा, मुस्कुरा दिये।
तन्हाइयाँ रोने के लिये, होती हैं यारों, इन आँसुओं से ख़ूब नहा, मुस्कुरा दिये।
ख़ुशियाँ जो मिलीं तुमको, घड़ी दो घड़ी ‘साकित’, ये रब का था एहसान रहा, मुस्कुरा दिये।
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