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आलेख


सुपेकर राजस्थान में सम्मानित
श्री सन्तोष सुपेकर को डीग, राजस्थान में हिंदी पुस्तकालय समिति के 100वें स्थापना दिवस पर इंजीनियर रमेशदत्त-नीरज दत्त शर्मा लघुकथा पुरस्कार 2026 प्रदान किया गया। पुष्पहार, श्रीफल, स्मृति चिन्ह, प्रमाण पत्र व सम्मान राशि सहित यह अखिल भारतीय सम्मान लघुकथा लेखन में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए दिया गया।
मुख्यमंत्री ने किया”ओढ़नी” का विमोचन

मालवी भाषा एवं मालवा की लोकसंस्कृति को समर्पित श्रीमती संगीता तल्लेरा के काव्य संग्रह “ओढ़नी” का विमोचन मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के करकमलों से गीता भवन में गरिमामय वातावरण में हुआ।
श्रीमती रश्मि मोयदे विशिष्ट अतिथि

दिव्यालय एक साहित्यिक यात्रा, बिहार (अंतरराष्ट्रीय ) जैसे बड़े मंच के ऑनलाइन आयोजन में श्रीमती रश्मि मोयदे को विशिष्ट अतिथि बनाया गया।
विशेष भेंटवार्ता का प्रसारण

29 जुलाई को आकाशवाणी उज्जैन केंद्र से गुरु पूर्णिमा पर विशेष भेंटवार्ता ,डॉ. वंदना गुप्ता, प्राचार्य, कन्या महाविद्यालय से अनामिका चक्रवर्ती की विशेष चर्चा प्रसारित की गई।
डॉ. नेत्रा रावणकर का संबोधन

साहित्य, कला एवं दर्शन को समर्पित संस्था “भाव प्रबोध ” में गुरुपूर्णिमा के पावन पर्व पर “भारतीय दर्शन में गुरु का महत्व” विषय पर डॉ. नेत्रा रावणकर ने संबोधित किया ।
श्री सुगन चंद्र जैन का सम्मान

जीवन बीमा निगम ऑफिस में गुरु पूर्णिमा के अवसर पर श्री सुगन चंद्र जैन का सम्मान किया गया।
स्वाधीनता से लेकर सुराज तक की चिंता है प्रेमचंद के कथा साहित्य में – प्रो. शर्मा

उज्जैन।सम्राट् विक्रमादित्य विश्वविद्यालय, उज्जैन की हिंदी अध्ययनशाला, प्रेमचंद सृजन पीठ तथा डॉ. देवेन्द्र जोशी स्मृति साहित्य विमर्श परिषद् के संयुक्त तत्वावधान में प्रेमचंद जयंती के अवसर पर एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। प्रेमचंद के कथा साहित्य और स्वाधीनता आंदोलन पर केंद्रित यह संगोष्ठी 31 जुलाई को विश्वविद्यालय परिसर स्थित वाग्देवी भवन में सम्पन्न हुई। मुख्य अतिथि के रूप में प्रसिद्ध लोकमनीषी एवं समालोचक डॉ. धर्मेंद्र पारे, भोपाल उपस्थित थे। कार्यक्रम की अध्यक्षता कुलानुशासक प्रो. शैलेंद्र कुमार शर्मा ने की।
मध्यप्रदेश आदिवासी बोली विकास अकादमी भोपाल के निदेशक डॉ. धर्मेंद्र पारे ने मुंशी प्रेमचंद के साहित्य पर प्रकाश डालते हुए कहा कि हम उनके साहित्य के आधार पर अपना लोकतंत्र सुंदर रूप में गढ़ सकते हैं। प्रेमचंद के कथा साहित्य में मध्यप्रदेश भी उपस्थित रहा है। बुंदेलखंड के वीर हरदौल, महाराजा छत्रसाल, राजा चम्पतराय आदि के योगदान का उन्होंने जीवन्त चित्रण किया है।
कुलानुशासक एवं समालोचक प्रो. शैलेन्द्र कुमार शर्मा ने अपने उद्बोधन में कहा कि प्रेमचंद जी ने कागज पर लिखे शब्दों का जीवन के साथ सामंजस्य बैठाया है। उनके कथा साहित्य की चिंता स्वाधीनता, स्वराज्य से लेकर सुराज तक की है। स्वाधीनता संग्राम के स्पंदन को उन्होंने साहित्य में जीवंत रूप में प्रस्तुत किया है। उस दौर में, प्रेमचंद ने अपनी कलम को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल करने का फैसला किया। उन्होंने अपनी कहानियों के माध्यम से देशप्रेम की प्रचण्ड भावना को स्वर दिया, जो हर भारतीय के दिल में सुलग रही थी। उनकी कहानियों ने ब्रिटिश सत्ता की नींव हिला दी थी और भारतीय जनमानस में देशभक्ति का नया ज्वार ला दिया था।
पूर्व महाप्रबंधक, मुंबई डॉ. शशांक दुबे ने प्रेमचंद के साहित्य पर बनी महत्वपूर्ण सामाजिक फिल्मों की विशेषताएँ बताते हुए अपना उद्बोधन प्रस्तुत किया। ललित कला विभागाध्यक्ष प्रो. जगदीश चंद्र शर्मा ने अपने उद्बोधन में बताया कि भारतीय समाज की विसंगतियों को प्रेमचंद जी ने कथा साहित्य में चित्रित करते हुए समाधान प्रस्तुत किए हैं। कवयित्री श्रीमती सीमा देवेंद्र जोशी, डॉ. देवेन्द्र जोशी स्मृति साहित्य विमर्श परिषद्, उज्जैन ने प्रेमचंद जी के प्रति सरस छन्दों की प्रस्तुति दी। साहित्यकार श्री संतोष सुपेकर ने अपनी लघुकथा का पाठ किया।
कार्यक्रम की शुरुआत में स्वागत भाषण प्रेमचंद सृजन पीठ, उज्जैन के निदेशक श्री मुकेश जोशी ने दिया। अतिथियों द्वारा वाग्देवी एवं मुंशी प्रेमचंद के चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित की गई। डॉ धर्मेंद्र पारे को शॉल, साहित्य और मौक्तिक माल अर्पित कर उनका सारस्वत सम्मान किया गया। इस अवसर पर वरिष्ठ पत्रकार एवं साहित्यकार स्वर्गीय श्री देवेंद्र जोशी की स्मृति में विवि परिसर में वृक्षारोपण किया गया।
आयोजन में साहित्यकार डॉ उर्मि शर्मा, डॉ हरीश कुमार सिंह, सुरेंद्र सर्किट, डॉ स्वामीनाथ पाण्डेय, डॉ हरिशंकर वट, डॉ नेत्रा रावणकर, श्री लक्ष्मीनारायण सिंहरोड़िया, डॉ महिमा मरमट आदि सहित बड़ी संख्या में विद्वानों, शोधार्थियों और साहित्यप्रेमियों की उपस्थिति रही।
कार्यक्रम का संचालन प्रो. जगदीश चंद्र शर्मा ने किया और आभार प्राध्यापक डॉ सी. एल. शर्मा रतलाम ने माना।
