तक्षित साहित्य धारा
बच्चे
दिलीप जैन,उज्जैन
आकाश में उड़ने दो, पंछी सा चहकने दो बुत सा तराशो मत, पौधों सा पनपने दो
निर्भीक इन्हें रहने दो, ताप शीत सहने दो रस्ता खुद बना लेंगे इन्हें दरिया-सा बहने दो
रास्ता तो दिखाओ पर रास्ते पर धकेलो मत हौसला अफजाई करो सपनों से खेलो मत
झूठ मत पठाओ इन्हें, सच्चे ही रहने दो लादो मत बड़प्पन इन पर, इन्हें बच्चे ही रहने दो
इन्हें सच्चे ही रहने दो इन्हें अच्छे ही रहने दो
