कालजयी कवि कालिदास
डा. रमेश चांगेसिया प्रभात
राष्ट्रीय ओजस्वी कवि, गीतकार उज्जैन

विदुषी विद्योतमा से शास्त्रार्थ में
जब परास्त हो गए थे, कालिदास।
मूर्ख कहकर लज्जित होने पर,
ज्ञानार्जन हेतु बने वे मां काली के दास।।
घोर तपस्या कर गढ़कालिका की
पाया मां से सृजन का आदित्य ।
साहित्य साधना करके कवि ने
दिया देश को कालजई साहित्य।।
महाराजा विक्रमादित्य के थे,
कविवर नव रत्नों में एक।
मन प्रांजल हृदय से सजल,
संवेदनशील कवि बहुत ही नेक।।
भारतीय प्रज्ञा और दर्शन पर,
कवि कालिदास ने किया सृजन।
रघुवंशम, मालविकाग्नि, मेघदूत ने
जगत में हिन्द को दिया सम्मान।।
विक्रमोवर्षीय, कुमार सम्भव रचना ने,
जन-जन का पथ प्रशस्त किया ।
कालिदास भक्त मां गढ़कालिका के,
जन मन मानस को आश्वस्त किया ।।
ऋतुसंहार से कवि कालिदास ने
प्रेम मिलन के मधुर भाव जगाएं।
उमा, शिव के परिणय उत्सव को,
कुमार सम्भव कृति में कवि ने गाए।।
रामबोला था मन से अति भोला,
मां कालिका से आशीष प्रताप पाए ।
बने कालिदास कवि कुल गौरव ,
जन, मन की पीढ़ा को गीतों में गाए।।
विश्व साहित्य की बहुमूल्य कृति
अभिज्ञानशाकुंतलम् कह
उज्जयिनी की ‘ज्ञान टेकरी’ पर
कालिदास ने ज्ञान की ज्योति जलाई।।
नाट्य , काव्य, गीत, छंद लिख कर,
जन-जन को दे गए नव उल्लास ।
भारतीय शस्य श्यामला को हर्षित कर
अमर हुए कालजयी कवि कालिदास।।
