साहित्य

आनन्द लें रक्षाबंधन, बाबा महाकाल की सवारी सहित गजलों का

01
गजल
– दिनेश ‘दर्द
✦ ❖ ✦
टूट कर आँखों से मोती बिखर जाते हैं,
कई सहराओं के मुक़द्दर संवर जाते हैं
कुछ बातों का यूँ कोई मतलब नहीं होता और,
कुछ बातों से दिल के भरम टूट जाते हैं
अजीब प्यास है दरियाओं के मुक़द्दर में,
तश्नगी बढ़ती है, तो किनारे सूख जाते हैं
वो अक्सर मुझे देख कर जब मुस्कुराती है,
दिल के तालाब के सारे कँवल भीग जाते हैं
दिल के टूटे हुए टुकड़ों पर भी नाज़ है ‘दर्द’,
पैहम आस्मां पर सूरते अंजुम झिलमिलाते हैं।
शब्दार्थ-
सहराओं = रेगिस्तान का बहुवचन
भरम = वहम, ग़लतफ़हमी
तश्नगी = प्यास
पैहम = निरंतर, लगातार
सूरते अंजुम = सिताराें की तरह
✦ ─── ❖ ─── ✦

02
पर्यावरण बचाना है
( गीत )
सुरेन्द्र सिंह राजपूत ‘हमसफ़र’
देवास (मध्यप्रदेश)
मोबाईल नम्बर – 9826929480
✦ ❖ ✦
सुनो भाइयों नारा ये
जन-जन तक पहुँचाना है ।
पर्यावरण बचाना हमको
पर्यावरण बचाना है ।
आओ लगायें पौधे हम,
ख़ूब बढायें हरियाली ।
करें वनों की पूर्ण सुरक्षा,
वन उपजों की रखबाली ।
स्वच्छता का ध्यान रखें हम,
बात ये सबको बताना है ।
पर्यावरण बचाना हमको …..
साफ़ स्वच्छ हो शहर हमारा,
निर्मल हो हर गाँव हमारा ।
दूषित जल नदियों में न जाये,
इसका हो उपयोग दोबारा ।
स्वास्थ्य हमारा सबसे बड़ा धन,
ये सबको समझना है ।
पर्यावरण बचाना हमको …..
यहाँ वहाँ कचरा न फेंके,
डालें कूड़ेदान में ।
कर्तव्यों से प्यार करें हम,
जियें स्वभिमान से ।
दीन दुखी की सेवा करके,
स्वच्छ समाज बनाना है ।
पर्यावरण बचाना हमको …..
सुनो भाइयों नारा ये,
जन-जन तक पहुँचाना है ।
पर्यावरण बचाना हमको ……।
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03
ग़ज़ल
– आशीष ‘अश्क‘
✦ ❖ ✦
मुसीबतों में यही ख़याल घुमड़ता है
बुरे वक़्त में सब कुछ सहना पड़ता है
सूरज है तो कोई नहीं फिर इस नभ में
कुछ पाने को तन्हा होना पड़ता है
मेल-मिलाप जमा-पूँजी रिश्तेदारी
देती हैं जब धोका रोना पड़ता है
मौजूदा हालात हैं सच हद से बाहर
पड़े पड़े तो मीठा फल भी सड़ता है
अपने को पाने की ख़ातिर दुनिया में
अपने को लाज़िम ही खोना पड़ता है
कोई कैसे समझाए इस नादाँ को
ऊपर चढ़ो तो आगे झुकना पड़ता है
जाने भी दो जो होता है होने दो
मजबूरी से यही फ़लसफ़ा लड़ता है
‘अश्क‘ तुझे मा‘लूम नहीं इस दुनिया में
मर मर के भी अक्सर जीना पड़ता है
✦ ─── ❖ ─── ✦

04
बादल
संगीता तल्लेरा
✦ ❖ ✦
बादल, कितना सुंदर है तुम्हारा स्वरूप,
अद्भुत है तुम्हारी हर एक घटा।
मानो श्वेत, मुलायम, मखमली आँचल ने
तुम्हें प्रेम से अपने आगोश में समेटा
सूर्य की सुनहरी किरणों से लिपटा
तुम्हारा निर्मल सौंदर्य,
शालीनता और सौम्यता का
एक अनुपम पर्याय
पर जब ओढ़ लेते हो
काली घटाओं का आवरण
लगता है मानो
दुःख, वेदना और क्रोध
तुम्हारे मन पर छा गया ये वरण
बिजली की चमक को साथ लिए
आकाश में गर्जना करते हो
कभी धीमे, कभी प्रचंड
कभी अश्रुओंसी वर्षा बन
धरती का आँचल भिगो देते हो
मानो अपने अंतर्मन की पीड़ा
हमसे बाँट रहे हो
अपने अस्तित्व का एहसास
हमें करा रहे हो
पर जैसे ही थम जाता है तूफ़ान
लगता है
अब तुम रूठे नहीं
तुम्हारा मन फिर शांत हो गया है।
फिर खुला-खुला सा आकाश
सतरंगी इंद्रधनुष की मुस्कान
नयनों में नए सपने जगा देती है।
बरसात दुःखों की धूल बहा ले जाती है,
धरती पर हरियाली की चादर बिछा जाती है।
और तुम
श्वेत-रजत आभा से दमकते बादल
फिर से उतने ही कोमल
उतने ही सुंदर लगते हो।
तुम्हें देखकर जाना है मैंने
सुख और दुःख का यह ताना-बाना
जीवन में कभी नहीं थमता।
हर अँधेरी घटा के बाद
एक उजला आकाश अवश्य आता है।
✦ ─── ❖ ─── ✦

05
बहन
-प्रभाकर शर्मा
✦ ❖ ✦
बहुत कठिन था जीवन
जीवन
जी गई तुम।
आसान कुछ नहींं था
आसानी से
जीवन जी गई
तुम।
देवी सम तुम
सदा प्रसन्न
कभी उफ्फ नहींं की
शांत जीवन
जी गई तुम।
तपस्यारत,
तपस्विनी तुम
तपस्यारत जीवन
जी गई
तुम।
तुम,जीवन और ईश्वर
एक ही हैं
सत्य, शिव‌ और सौंदर्य
अवतरित जीवन में
आध्यात्मिक जीवन
जी गई
तुम।
हर हर महादेव
कह गई
तुम।
यही उपलब्धि रही तुम्हारी
समस्याओं से घिरा
शान्ति पूर्वक बीता
जीवन‌।
बहुत कठिन था सब
तुम्हारे लिए
कैसे सहज रही
जीवनभर।
सुख दुःख जीवन में
दुख बीता
बीता जीवन
कठिन घड़ी में
आसानी से
आकाश
छू गई
तुम ।
तुम ही तो रक्षा थी हमारी
मातु ,पिता, ईश्वर सी
चली गई रक्षा
तुम।
✦ ─── ❖ ─── ✦

06
महाकाल की निकली सवारी
अनिल पांचाल ‘सेवक’
✦ ❖ ✦
पौराणिक नगरी अवंतिका सजी है प्यारी – प्यारी,
श्रद्धा लेकर आ पहुंचे हैं सैकड़ों नर – नारी।
मालवा की सर्वोत्तम नगरी उज्जैनी कहलाती ,
महाकाल आशुतोष के, मां क्षिप्रा चरण धुलाती।
हरसिद्धि और गढ़कालिका के दर्शन की बलिहारी ।।
श्रद्धा लेकर आप पहुंचे हैं सैकड़ों नर – नारी।।
सांदीपनि के आश्रम में कृष्ण-सुदामा ने शिक्षा पाई ,
इतिहास गवाह है अवंतिका का, है यह पुराणों की सच्चाई।
चिंतामन और मन्छामन ने हर ली विपदा सारी ।।
श्रद्धा लेकर आ पहुंचे हैं सैकड़ों नर – नारी।।
सिद्धनाथ और काल भैरव की कहानी बड़ी सुहानी ,
मंगलनाथ और गंगा घाट की महिमा बड़ी निराली।
नवरत्नों के साथ विराजे विक्रमादित्य न्यायकारी।।
श्रद्धा लेकर आ पहुंचे हैं सैकड़ों नर – नारी।।
कालिदास की कविताओं ने साहित्य को दी ऊंचाई ,
मानो या न मानो साहित्य ने ही सबको राह दिखाई।
ऋणी हूं साहित्यकारों का, ह्रदय से हूं आभारी।।
श्रद्धा लेकर आ पहुंचे हैं सैकड़ों नर – नारी ।।
सप्त पुरी मैं श्रेष्ठ पुरी यह इसकी महिमा न्यारी ,
बार-बार जन्म लूं इस भूमि पर, जाऊं मैं बलिहारी।
कर्मभूमि बनी यह मेरी, मुझे लगे अवंतिका प्यारी।।
श्रद्धा लेकर आ पहुंचे हैं सैकड़ों नर – नारी।।
स्वागत मंच और तोरण द्वार से नगर हुआ मनोहारी ,
एक झलक निहारन को, कर जोड़ें ठाड़ी जनता सारी।
सेवक भी भक्तों के संग गा रहा महाकाल की निकली सवारी।।
श्रद्धा लेकर आ पहुंचे हैं सैकड़ों नर नारी।।
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07
राखी का महत्व
कमल पटेल चकरावदा
✦ ❖ ✦
जब रक्षा सूत्र बंधन हेतु ,
मैंने हाथ बढ़ाया।
तब बहन ने बांध राखी,
मुझको इसका महत्व बताया।।
भैया! सूत्र नहीं ये साधारण।
श्रद्धा से तुम करो इसे धारण।।
राजा बली का बल है इसमें,
हेै मॉं लक्ष्मी का स्नेह।
हर विपदा से रक्षा करता,
सुरक्षित रखता देह।।
भाई बहन के रिश्ते का,
परिलक्षित होता है अपनत्व।
नाम है भैया राखी इसका,
राखी का है बड़ा महत्व।।
सूत्र नहीं संकल्प है।
रक्षा का ये विकल्प है।।
रक्षा करना मानवता की,
रक्षा करना राष्ट्र की।
रक्षा करना धरती की,
रक्षा करना आकाश की।।
दुखियों का तुम बनो सहारा,
भैया रखना मान हमारा।
जल जंगल को बचाना भैया,
अपना कर्तव्य निभाना भैया।।
हर प्राणी से रखना अपनत्व।
भैया राखी का है बड़ा महत्व।।
गुरुजनों का मान बढ़ाना,
राष्ट्र की तुम शान बढ़ाना।
माताओं का करना आदर,
जैसे चंदा और दिवाकर।।
बच्चों को देना संस्कार,
राष्ट्रहित को दे आकार।
वृद्धजनों का हो सम्मान,
बनाए रखना कुल का मान।।
रेशम का ये धागा भैया,
रिश्तो का है अपनत्व।
नाम है भैया राखी इसका,
राखी का है बड़ा महत्व।।

साहित्य में एक नई जमीन तोड़ता है उपन्यास ‘ढाई इंच पर दौड़ती जिंदगी’ – प्रो. शर्मा
✦ ❖ ✦

सन्तोष सुपेकर के उपन्यास का विमोचन

उज्जैन। उपन्यास ‘ढाई इंच पर दौड़ती जिंदगी’ मनुष्य जीवन के यंत्रवत हो जाने की त्रासदी का सजीव चित्रण है। भारतीय रेल केवल परिवहन नहीं, बल्कि समाज और संस्कृति का जीवंत दस्तावेज़ है। लेखक ने रेल कर्मियों, विशेषकर लोको पायलटों के कठिन जीवन, अंतर्बाह्य संघर्ष और पीड़ा को यथार्थ रूप में प्रस्तुत किया है।

ये विचार प्रेमचन्द सृजन पीठ उज्जैन और सरल काव्यांजलि के संयुक्त तत्वावधान में प्रेस क्लब में आयोजित लेखक संतोष सुपेकर के उपन्यास ‘ ढाई इंच पर दौड़ती जिन्दगी ‘ के विमोचन प्रसंग में सारस्वत अतिथि , समालोचक एवं सम्राट विक्रमादित्य विवि के कुलानुशासक प्रो. शैलेंद्र कुमार शर्मा ने व्यक्त किये। आपने कहा कि संतोष सुपेकर का यह उपन्यास हिंदी कथा साहित्य में एक नई जमीन तोड़ता है क्योंकि आम आदमी और किसान पर तो बहुत लिखा गया है, पर लोको पायलट के मनोवैज्ञानिक और सामाजिक संघर्ष पर यह एक दुर्लभ कार्य है। यह कृति रेलकर्मियों के माध्यम से मनुष्य की अविराम जिजीविषा और कभी न रुकने वाले कदमों का प्रवाहमय वृत्तांत है। उपन्यास की सबसे बड़ी विशेषता इसकी प्रामाणिकता है।

प्रमुख अतिथि सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय , कार्यपरिषद के वरिष्ठ सदस्य राजेश सिंह कुशवाह ने कहा कि यह उपन्यास रेल के लोको पायलट की कठिन सेवा और उनके लोको पायलट के रूप में कार्य करने के रोमांचकारी विचित्र अनुभवों का निचोड़ है | अध्यक्षता करते हुए प्रसिद्ध मालवी कवि डॉ. शिव चौरसिया ने कहा कि सुपेकर जी ने रेल की जिन्दगी में डूबकर , अपने सफ़र को शब्दों में इस उपन्यास में बखूबी व्यक्त किया है | विशेष अतिथि सुप्रसिद्ध कथाकार मनीष वैद्य (देवास )ने कहा कि उपन्यास विधा एक बड़ी विधा है और उसे साधना कठिन होता है मगर सुपेकर जी अपने उपन्यास में खरे उतरे हैं और एक अनछुए विषय पर लाजवाब उपन्यास की रचना की है | विशेष अतिथि मनीष शर्मा ( देवास ) ने कहा कि रेल का आकर्षण हमारे अवचेतन में रहता है मगर सुपेकर जी ने रेल का दूसरा पक्ष इस उपन्यास के जरिये रखा है।

स्वागत भाषण देते हुए प्रेमचंद सृजन पीठ के निदेशक मुकेश जोशी ने कहा कि लघुकथाकार के रूप में विख्यात सुपेकर जी अब उपन्यास लेखन के लिए भी जाने जायेंगे। आरम्भ में माता सरस्वती और प्रेमचंद जी के चित्र पर माल्यार्पण और दीप आलोकन कर अतिथियों ने प्रसंग का शुभारम्भ किया। सरस्वती वंदना डॉ. राजेश रावल ने प्रस्तुत की | अतिथि स्वागत सरल काव्यांजलि के अध्यक्ष डॉ. संजय नागर, दिनेश दिग्गज , मानसिंह शरद , रमेश जाजू , संतोष सुपेकर , राजेन्द्र नागर , डॉ. पुष्पा चौरसिया , संदीप नागर , हर्ष सैनी , अनिल चौबे , नितिन पोल आदि ने किया।आयोजन में डॉ. राजशेखर व्यास , डॉ.जगदीश शर्मा , डॉ. विश्वामित्र राय , डॉ. उर्मि शर्मा , डॉ. प्रीति जोशी , डॉ. रश्मि मोयदे , डॉ. पांखुरी वक्त , डॉ.वंदना गुप्ता ,आशागंगा शिरढोणकर ,सुमन नागर राजेश ठाकुर , आशीष ‘अश्क’, संदीप सृजन,

वी. एस. गहलोत, डॉ. नेत्रा रावणकर , सुगनचंद जैन , डॉ. संगीता कारलेकर , डॉ. मोहन बैरागी , एम. जी सुपेकर , भूषण जी , अनिल पांचाल आशीष चौरे आदि उपस्थित रहे |अतिथियों को स्मृति चिन्ह संतोष सुपेकर और राजेन्द्र देवधरे दर्पण ने प्रदान किये।

संचालन मध्यप्रदेश लेखक संघ के सचिव डॉ. हरीशकुमार सिंह ने किया और आभार नितिन पोल ने व्यक्त किया।

आभार,आभार,आभार,धन्यवाद

तक्षित न्यूज़ ‘तक्षित साहित्य धारा’ के सम्मानीय पाठकों के सहयोग से तक्षित न्यूज़ साहित्य धारा तेजी से उन्नति की और अग्रसर है। अब इसका प्रसार देश ही नहीं विदेशों में भी हो रहा है ऑस्ट्रेलिया अमेरिका और इंग्लैंड जैसे देशों में भी आपकी रचनाएं पढ़ी जा रही है। बहुत-बहुत धन्यवाद आभार। संपादक राजेंद्र देवधरे ‘दर्पण’ जी का भी बहुत-बहुत धन्यवाद, आभार, आपकी मेहनत रंग ला रही है।

Dr. Sanjay Nagar

Author & Co-Founder Takshit News

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