मन्नत
लघुकथा
मीरा जैन
516,साँईनाथ कालोनी.
सेठीनगर,उज्जैन(म.प्र.)

स्मिता की उतावलेपन से भरी आवाज गूंजी-
‘अरे कमली ! काम बाद में कर लेना नवरात्रि के दिन चल रहे हैं चल मेरे साथ मंदिर, वहां पर्ची डालने की पेटी रखी हुई है, इन दिनों जो भी भक्त पूरी श्रद्धा से अपनी मन्नत लिखकर उस पेटी में पर्ची डालता है उसके मनोरथ पूर्ण होने की संभावना अधिक होती है। मंदिर में अनेक ऐसे दानवीर आते हैं जो चुन-चुन कर गरीब व्यक्तियों के नाम की पर्चियां उठाते हैं और उस पर लिखी मन्नत वह पूरी शिद्दत के साथ आर्थिक सहायता देते हुए पूर्ण करते हैं। अब सोच क्या रही है, चल जल्दी चल, तेरी तो सास बीमार है, पति एक्सीडेंट के कारण बिस्तर पर पड़ा है, बच्चा भी छोटा है —।’
इसके साथ ही उसने कमली को एक सादा कागज एवं पेन दे मन्नत लिखने को कहा और स्वयं भी मन्नत लिखने बैठ गई। कुछ देर पश्चात वे दोनों मंदिर में देवी का पूजन अर्चन कर अपनी-अपनी पर्चियां पेटी में डाल आई।
रास्ते में स्मिता ने कमली को सांत्वना देते हुए कहा-
‘ देखना कमली ! कल ही तेरा मनोरथ पूर्ण हो जाएगा कोई न कोई दानवीर तेरी मन्नत को पूरा कर ही देगा, पर्ची पर अपना मोबाइल नंबर तो लिखा है न?’
‘ हां मैडम जी ! आपके कहे अनुसार सब कुछ लिख दिया था, आप बहुत अच्छी हैं मेरा कितना ख्याल रखती हैं।’
दो-तीन-चार दिन यहां तक की नवरात्रि भी समाप्त हो गई किंतु कमली के पास सहायता हेतु कोई फोन नहीं आया। स्मिता को भी आश्चर्य हो रहा था-
‘ कमली ! तूने जरूर मोबाइल नंबर गलत लिखा होगा?’
कमली ने बड़े ही सहज भाव से उत्तर दिया-
‘ मैडम जी! आपके कहे अनुसार मैंने अपनी मन्नत लिख दी थी किंतु वह ऐसी मन्नत थी जिसे कभी कोई पूरा कर ही नहीं सकता था ।’
‘ ऐसा क्या मांगा था देवी मां से तूने?’
‘ मैडम जी ! मैंने पर्ची पर लिखा था कि, ‘हे देवी मां ! मुझे इतनी शक्ति देना कि जिंदगी में कभी भी दूसरों के आगे हाथ न फैलाना पड़े।’
