तक्षित साहित्य धारा
मेरे मन की सोन चिरैया
नवगीत
अशोक रक्ताले ‘फणीन्द्र’

फूलों ने कुछ गीत सुनाए, कलियों ने आभार किया। मेरे मन की सोन चिरैया, तुमने जब श्रृंगार किया।
लगीं नाचने तेज हवाएँ, काले बादल घिर आए।
और सुधा बरसाते सारे, नीलगगन पर लहराए।
सन-सन-सन चलकर पछुआ ने बागों को हुशियार किया।
कुछ शब्दों ने अर्थ चुना नव तो कुछ-कुछ थे घबराए। भावों की बहती धारा से कितने गीत निकल आए।
ख़ामोशी ने शब्द अनकहे कह-कहकर सत्कार किया।
