
सबसे प्यारा अपना हिन्दोस्तान है

व्ही.एस. गेहलोत ” साकित ”
मोबाइल नंबर :- 93298 98943
दुनिया में जिसके जज़्बों की इज्ज़त है शान है।
वो सबसे प्यारा अपना हिन्दोस्तान है।
इंद्रधनुषी रंगों की इसमें छटा न्यारी,
तीन ख़ास रंगों का इसका निशान है।
जुदा-जुदा हैं उंगलियां जैसे हाथ में,
भिन्नता में एकता ही हमारा मान है।
शक्ति और भक्ति से लबरेज़ देश मेरा,
सुन्दरता, सरलता, धर्म और ईमान है।
दूध, फल, फसलों की सम्पन्नता यहां,
ये पालक, पोषक है और हमारी जान है।
पर्वत, ताल,नदियों का वरदान है यहां,
वन सम्पदा है और मौसम मेहरबान है।
हिन्दू, मुस्लिम, सिख,ईसाई, पारसी यहां,
मन्दिर, मस्जिद, गुरुद्वारे और गिरजा समान है।
जल,थल,नभ की सुरक्षा और तकनीकी,
नये अविष्कार हैं नया अनुसंधान है।
आज़ादी का ये पर्व करोड़ों बरस आये,
नतमस्तक है ” साकित ” मेरा भारत महान है।
विश्व गुरु बने देश, सोने की चिरैया बने

डाॅ. रमेश चांगेसिया प्रभात
राष्ट्रीय ओजस्वी कवि गीतकार बड़नगर
चांद, सितारों से मां धरा को हम सजाएंगे,
मां भारती के बेटे का हम फर्ज निभा जाएंगे।
जननी ने दिया जन्म मां वसुधा ने दिया अन्न,
दोनों माताओं का हम कर्ज चुका जायेंगे।
देश ,धरती का मान दुनिया में बड़े सदा
कलम से कवि का वह धर्म निभा जाएंगे।।
सीमाओं पर घुसपैठ किंचित न होने देंगे,
देश रक्षा का सदा पैगाम देकर जायेंगे।
मातृभूमि की पीड़ा को अपनी पीड़ा कहेंगे,
रोम-रोम से मां का जय गान कह जाएंगे।
आजादी की आन- बान के लिए जिएंगे सदा,
मरते-मरते हम वन्दे मातरम् कह जाएंगे।।
ऋषि ,मुनि, देवता और शहीदों की धरती है,
मां भारती के बेटे हम मां के चरण पखारेंगे।
विश्व गुरु बने देश, सोने की चिरैया बने,
राष्ट्र धर्म ऐसा मिल कर निभा जाएंगे ।
देश के तिरंगे पर आंच कभी आई तो,
हंसते हंसते हिन्द को प्राणदान देकर जायेंगे।
अमर शहीदों का लहू पुकारे

रमेश चंद्र मंदोरिया ‘मयंक’
अमर शहीदों का लहू पुकारे,
हर एक भारतवासी को ।
याद करो रे सुखदेव राजगुरु,
भगत सिंह की फांसी को।।
अपने बेटे की बली देकर, जो राष्ट्र धर्म को निभा गई ।
स्वतंत्रता प्राण से प्यारी है,
जो सारे जग को बता गई ।
मत भूलो पन्नाधाय को,
झलकारी रानी झांसी को ।
याद करो रे सुखदेव राजगुरु
भगत सिंह की फांसी को ।
अमर शहीदों का लहू पुकारे…
ओ चेतक वाला महाराणा,
अकबर के आगे झुका नहीं ।
जो मुगलों के लिए काल बना,
ओ वीर शिवाजी रुका नहीं।
मत भूलो हल्दीघाटी को,
पानीपत और प्लासी को ।
याद करो रे सुखदेव राजगुरु
भगत सिंह की फांसी को ।
अमर शहीदों का लहू पुकारे….
जिस धरती पे यमुना गंगा है ,
कृष्णा कावेरी नदियां है ।
सतपुड़ा विंध्य हिमालय की
चोटी से बोलती सदियां है ।
रामेश्वर के पावन सागर को,
और बुद्ध की सांची को।
याद करो रे सुखदेव राजगुरु भगत सिंह की फांसी को ।
अमर शहीदों का लहू पुकारा
धर्म संस्कृति ज्ञान विज्ञान,
जहां से फैले हैं
दया धर्म सद्भाव प्रेम है,
मानवता के मेले हैं
उज्जैन नासिक हरिद्वार प्रयागराज और काशी को
याद करो रे सुखदेव राजगुरु भगत सिंह की फांसी को
अमर शहीदों का लहू पुकारा…..
स्वतंत्रता का पावन उत्सव
कमल पटेल चकरावदा

स्वतंत्रता का पावन उत्सव,
हम मिलकर आज मनाएंगे।
शान तिरंगे की रखेंगे,
नया इतिहास बनाएंगे।
स्मरण करेंगे उन वीरों का,
जिसने देश स्वतंत्र कराया।
वह हर वीर हमारा था,
जिसने अपना लहू बहाया।।
छोड दिए घर देश की खातिर,
हम उनको शीश नवाएंगे।
शान तिरंगे की रखेंगे,
नया इतिहास बनाएंगे।।
स्वतंत्रता का पावन उत्सव,
हम मिलकर आज मनाएंगे….
राष्ट्रध्वज का हो सम्मान,
घट ना पाए इसका मान।।
ध्वज का कर सम्मान हम,
देश का मान बढ़ाएंगे।
शान तिरंगे की रखेंगे,
नया इतिहास बनाएंगे।।
स्वतंत्रता का पावन उत्सव,
हम मिलकर आज मनाएंगे…
राष्ट्रध्वज ना झुकने पाए,
इस बात का रखना हमको ध्यान।
हे हम भारत देश के वासी,
तिरंगा है हमारी शान।।
हर घर तिरंगा फहरा कर,
देश की शान बढ़ाएंगे।
शान तिरंगे की रखेंगे,
नया इतिहास बनाएंगे।।
स्वतंत्रता का पावन उत्सव,
हम मिलकर आज मनाएंगे।
शान तिरंगे की रखेंगे,
नया इतिहास बनाएंगे।।
सपनो का भारत

नृसिंह इनानी
26 निकास चौराहा
उज्जैन
9977119675
सपने में सपनों का देखा मैंने अपने भारत को
उछल पड़ा जब न्यारा देखा मैंने अपने भारत को ||
मैंने देखा चौपालों पर गीत प्यार के बजते हैं
मैंने देखा खेत हमारे प्यारे प्यारे सजते हैं
पक्षी दल सब कलरव करते नदियाँ गीत सुनाती हैं
हरी-भरी वादी फूलों से लदी हुई मुस्काती है
सैलानी देखे सपने में शीश नवाते भारत को
उछल पड़ा जब न्यारा देखा मैंने अपने भारत को ||
सपने में सपनो का देखा मैंने अपने भारत को
उछल पड़ा जब न्यारा देखा मैंने अपने भारत को ||
नायिका सम्मान भाव से संस्कृति के गुण गाती है
नायक की टोली सीमा पर अपनी जान लुटाती है
नेता सब त्यागी बनकर के छोटे घर मे रहते हैं
जिनके पास नहीं सुख कोई उनको जीवन देते हैं
नहीं भिखारी कोई दिखा, देखा मेहनत- कश भारत को
उछल पड़ा जब न्यारा देखा मैंने अपने भारत को ||
सपने में सपनों का देखा मैंने अपने भारत को
उछल पड़ा जब न्यारा देखा मैंने अपने भारत को ||
जाति-पंथ की गिरी दीवारें सब लोगों का हाथ मिला
सपने में देखा गाँधी का भारत सबको साथ मिला
भ्रष्टाचारी दिखे जेल में खेल में तमगे जीत लिये
हिन्दू मुस्लिम सिख ईसाई आपस मे सब प्रीति लिये
कोई नहीं बीमार दिखा त्यौहार मनाते भारत को
उछल पड़ा जब न्यारा देखा मैंने अपने भारत को ||
सपने में सपनों का देखा मैंने अपने भारत को
उछल पड़ा जब न्यारा देखा मैंने अपने भारत को ||
बच्चे सारे पढ़े-लिखे बेकारी सारी सिमट गई
चोर लुटेरों की टोली भारत में सारी निपट गयीं
सीमाएं आबाद हुईं बर्बाद हुए दुश्मन सारे
कथनी करनी एक हुई और बन्द हुए सारे नारे
करवट बदली गिरा पलंग से आँख खुली हैरान हुआ
सपना टूटा देखा फिर अरमान लुटाते भारत को
सपने में सपनों का देखा मैंने अपने भारत को
उछल पड़ा जब न्यारा देखा मैंने अपने भारत को
स्वतंत्रता दिवस पर आत्ममंथन<

/strong>नितिन पोल
उज्जैन
15 अगस्त 1947 को भारत स्वतंत्र हुआ। ब्रिटिश औपनिवेशिक साम्राज्यवाद से आजादी मिली। स्वतंत्रता प्राप्त हुई तब हमारे यहां अनाज की कमी थी। विदेश से अनाज आयात करते थे। शिक्षा का अभाव था। महामारी में सैकड़ों जाने जाती थी। परंतु इन 79 वर्षों में हमने बहुत कुछ हांसिल किया। भाखड़ा डैम, परमाणु उर्जा, हरित क्रांति आदि। हम मंगल तक पहुंच गये। 5 रूपये जैसी छोटी राशि का भी डिजीटल भुगतान करने लगे हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेलों में भारत का नाम दिखने लगा है। उपग्रहों के द्वारा मौसम की सटीक जानकारी मिलने लगी है। परंतु हमें इतने पर आत्मसंतुष्ट होकर नहीं रहना है।
कड़े संघर्ष और त्याग के बाद मिली आजादी को उत्सव के रूप में मनाना चाहिए। परंतु यह सिर्फ उत्सव का दिन नहीं, बल्कि आत्मविश्लेषण का भी दिन है। हम सभी जानते हैं कि स्वतंत्रता सेनानियों ने अपने प्राण न्यौछावर कर स्वतंत्रता हासिल की। महात्मा गांधी,पं.नेहरू, नेताजी से लेकर भगतसिंह, चंद्रशेखर आजाद इन विभूतियों की कल्पना में जो स्वतंत्र भारत था, क्या ये वहीं भारत है? यह प्रश्न विचारणीय है। और इसलिए यह अवसर है,आत्ममंथन करने का।
हमारी अंतरात्मा हमें बिल्कुल नहीं कचोटती,जब सड़क पर दुर्घटना होती है, तो घायल की मदद करने की जगह हम विडियो बनाकर उसे वायरल करनें के लिए उत्साह दिखाते है। जब कि मानवता कहती हैं कि उसकी मदद करना चाहिए। इसीलिए शासन ने राहवीर योजना शुरु की है।जो काम मानवता के नाते करना चाहिए, उसके लिए सरकार को धन का लालच देना पड़ा।
नागरी व्यवस्था सुचारू रूप से चलाने के लिए एक प्रणाली बनाई गई है। परंतु हम धड़ल्ले से उस व्यवस्था को ठेंगा बताते हुए, नियम तोडते है। हम दूसरों की परेशानी का विचार नहीं करते। हम रिश्वत देकर नियम के बाहर काम करवाना चाहते हैं। सड़क पर हमारी ग़लती की वजह से कोई अन्य दुर्घटना में घायल होता है और कभी जान भी गंवा बैठता है।
स्वतंत्रता, हमें ब्रिटिश राज से मिली है। स्वतंत्रता का अर्थ उच्छृंखलता नहीं है। हमारी स्वतंत्रता वही तक है, जब तक दूसरों की स्वतंत्रता व निजता प्रभावित नहीं होती। हम अपने आचरण में इस बात का ध्यान नहीं रखते कि हमारी वजह से दूसरों को परेशानी नहीं होनी चाहिए।हमें डीजे उतनी ही आवाज में बजाना चाहिए कि दूसरों को तकलीफ़ न हो। सड़क पर यातायात नियमों का उल्लंघन कर हम दूसरों की जान दांव पर लगाते है। इसमें व्यक्तिगत नुकसान के अतिरिक्त देश का भी नुकसान होता है। जीडीपी पर प्रभाव पड़ता है।
हम स्वयं को देशभक्त कहलाते हैं, तो हमारे व्यवहार में वह दिखना चाहिए। सिर्फ भारत माता की जय या वंदे मातरम् कहकर देशभक्त नहीं कहलाते। व्यवस्था चलाने के लिए नियमों का पालन करना भी देशभक्ति है। देशभक्ति नारों तक सीमित न रहकर, हमारे आचरण में भी दिखाई देनी चाहिए। जाति, धर्म के आधार पर भेदभाव करना देश की एकता के लिए हानिकारक है। अतः एक देशभक्त नागरिक जाति और धर्म के आधार पर भेदभाव नहीं करता।
आइये, आज के दिन हम संकल्प करें कि हम देश की अखंडता और अक्षुण्णता के लिए कार्य करेंगे। आपस में भेदभाव नहीं करेंगे।
15 अगस्त हमें इतिहास पर गर्व करने के साथ भविष्य के प्रति जवाबदेह होने का संदेश देता है।
आइये, संकल्प लें कि एक सशक्त भारत और
एकता एवं सद्भाव से भरे भारत के निर्माण में अपना योगदान देंगे।
जय हिंद।
तिरंगा है शान हमारी
श्रीमती सुमन नागर उज्जैन
तिरंगा है शान हमारी तिरंगा है शान हमारी।
तिरंगा है आज हमारी तिरंगा है जान हमारी।।
तिरंगा है राष्ट्र प्रेम आजादी का द्योतक।
तिरंगे की शान है हमारा प्रथम कर्तव्य।।

प्रातः स्मरणीय अमर शहीदों के चारण उज्जैन निवासी श्रीयुत् श्रीकृष्ण ‘सरल’ जी ने अपने संपूर्ण जीवन काल में शहीदों पर लिखा इतना लिखा कि 12 महाकाव्य रच डालें। स्वयं को हमेशा अमर शहीदों का चारण कहने वाले श्रद्धेय सरल जी की एक रचना के प्रमुख अंश आज हम यहां प्रस्तुत कर रहे हैं-
साभार रचना
मैं अमर शहीदों का चारण
श्रीकृष्ण सरल
मैं अमर शहीदों का चारणउनके यश गाया करता हूँ
जो कर्ज राष्ट्र ने खाया है,मैं उसे चुकाया करता हूँ।
मैं अमर शहीदों का चारणउनके यश गाया करता हूँ।
पूजे न शहीद गए तो फिर, यह पंथ कौन अपनाएगा?
पूजे न शहीद गए तो फिर आजादी कौन बचाएगा?
फिर कौन मौत की छाया में जीवन के रास रचाएगा?
पूजे न शहीद गए तो फिर यह बीज कहाँ से आएगा?
धरती को माँ कह कर, मिट्टी माथे से कौन लगाएगा?

15 अगस्त हमारी स्वतंत्रता प्राप्ति का पर्व है। यह पर्व हमारे लिए सारे पर्वों में उत्तम माना जाता है। यह दिन अनेकानेक स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के बलिदानों को याद करने का दिन है।
हमारा देश आज हर क्षेत्र में उन्नति के नए-नए आयामों को छू रहा है लेकिन यह उन्नति अधूरी है। उन्नति की पूर्णता तो तब है जब जाति, धर्म, समुदाय और भाषाओं के भेदभाव से ऊपर उठकर हम देश की एकता और अखंडता की ओर सकारात्मक कदम उठाएं।
79 वें स्वतंत्रता दिवस की देश के सभी नागरिकों को हार्दिक शुभकामनाएं एवं बधाई।
राजेंद्र देवधरे ‘दर्पण’ साहित्य संपादक तक्षित साहित्य सुधा
प्रस्तुत अंक में प्रकाशित रचनाएं एवं लेख रचनाकारों के अपने विचार हैं

